VIVIDH BHARATI ONLINE...... RADIO CHANNEL,YOU LOVE THE MOST

you can find the removed items and pictures in full size at http://www.freewebs.com/vbharati

देश की बहु चर्चित एवं युवाओं की प्रिय WEBSITE THELALLANTOP.COM ने, रेडियो नामा पर प्रकाशित हो रही मेरी श्रृंखला कैक्टस के मोह में बंधा मन की, पहली २० कड़ियों को "रेडियो जुबानी"  के शीर्षक से मार्च २०१६ में, लगातार २० दिन तक प्रकाशित किया और वादा किया कि जब २० कड़ियाँ और पूरी हो जायेंगीं, तो उन्हें भी इसी तरह प्रतिदिन प्रकाशित किया जाएगा. सौरभ, विकास और उनकी पूरी नौजवान और ऊर्जा से लबरेज टीम का धन्यवाद .


रेडियो के लिए गुल्लक तोड़ने वाला बच्चा बना रेडियो स्टेशन का मुखिया

253
शेयर्स

तब जब हम और हमारे पापा भी लिटिल थे. रेडियो तब भी था. रेडियो अब भी है. कुछ लोग आज भी रेडियो का नाम सुनते ही फीलिंग नॉस्टेलजिया हो जाते हैं. रेडियो के ऐसे ही दीवानों के लिए दी लल्लनटॉप लाया है एक नई सीरीज रेडियो जुबानी.

इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ाएंगे. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे. इसी सीरीज की पहली किस्त में जानिए रेडियो के लिए गुल्लक तोड़ने वाले एक प्यारे बच्चे का किस्सा, ये बच्चा आगे जाकर रेडियो स्टेशन का मुखिया बना.


 

स्कूल से घर लौटकर बस्ता रखा. मुंह हाथ धोकर खाना खाने बैठा ही था कि दरवाज़े की सांकल बजी. सोचा, लाय (आग) बरसती ऐसी दुपहरी में कौन होगा भला? घर में और कोई था नहीं उस वक्त. भाई साहब अपने किसी क्लासमेट के यहां गए हुए थे. पिताजी अपने दफ्तर और मां मौसी के घर. उठकर दरवाज़ा खोला तो देखा पसीने में तर मेरा दोस्त हरि अपनी साइकिल को सामने के पेड़ की हल्की सी छाया में खड़ी कर दरवाज़ा खुलने की राह देख रहा है.

दरवाज़ा खुलते ही वो चिलचिलाती धूप से भागते हुए घर के अंदर घुस गया. बीकानेर की गर्मी के तेवर उन दिनों कुछ ज्यादा ही तेज हुआ करते थे. एसी जैसे चीज दूर की बात थीं. कूलर भी नहीं होते थे. पचास में से किसी एक घर में पंखा होता था और बाकी लोग खस की टट्टियां खिड़कियों पर लगाकर उस से छनकर कभी-कभार आती हवा से ही गुज़ारा किया करते थे. नींद की मीठी मीठी झपकियों के बीच बार बार हाथ के पंखे को झलना बहुत अखरता था और भगवान पर बड़ा गुस्सा आता था. कि वो गर्मी के मौसम में खूब तेज हवा क्यों नहीं चलाए रखता?

मगर हवा जो बंद होती थी तो कुछ इस तरह बंद होती थी कि पेड़ का पत्ता तक नहीं हिलता था. मुझे याद है कि घर में बिजली लगने से पहले कई बार मेरी मांरात रात भर बैठ कर हम लोगों को पंखा झलती रहती थीं. जब कई कई दिन इसी तरह गुजर जाते तो सब लोग भगवान से अरदास करते, हे भगवान और कुछ नहीं तो आंधी ही भेज दे.

भगवान को भी पश्चिमी राजस्थान की इस धोरों (रेत के टीलों) की धरती पर बसे हर तरह के अभाव झेलते लोगों पर थोड़ी दया आ जाती और इधर उधर से कोई आवाज़ आ जाती. अरे काली पीली आंधी आ रही है रे .. और सब लोग उठ खड़े होते थे काली पीली आंधी को देखने के लिए.

क्षितिज पर उभरता एक छोटा सा काला पीला धब्बा थोड़ी ही देर में रेत का समंदर बनकर पूरे आकाश को ढंक लेता था. हर ओर बस रेत ही रेत. सड़क की बत्तियां जला दी जाती थीं, क्योंकि इस काली पीली आंधी की परत इतनी मोटी होती थी कि सूरज की तेज किरणें भी उस परत को भेद नहीं पाती थीं. हर तरफ मिचमिचाती आंखें और सर पर रुमाल या गमछा लपेटे लोग. और हां हर आंख रेत से कड़कड़ाती हुई और हर मुंह रेत से भरा हुआ.

ये आंधी लगातार कई कई दिनों तक चलती रहती थी. इसी रेत की आंधी के बीच सोना. इसी रेत के बीच उठना. इसी के बीच नहाना धोना और इसी के बीच खाना पीना. सुबह सोकर उठते तो देखते कि जिस करवट सोए थे उस करवट पर शरीर के साथ साथ रेत का एक छोटा सा टीला बन गया है और पूरा मुंह रेत से भरा हुआ है. आंखों को बहुत देर तक खोल नहीं पाते थे क्योंकि आंख की पलकें रेत से भरी हुई होती थीं. मगर ये रेत की काली पीली आंधी अपने साथ एक ऐसी सौगात लेकर आती थी जिसकी वजह से इतनी तकलीफों के बावजूद ये आंधी हमें बुरी नहीं लगती थी. ये सौगात थी- गर्मी से राहत.

जितने दिन ये आंधी चलती रहती थी ज़ाहिर है. हवा भी चलती रहती थी और हवा चलने का मतलब गर्मी से ज़बरदस्त राहत. मैं जल्दी से हरि को ड्राइंग रूम में ले गया जहां पंखा लगा हुआ था. एक खिड़की में खस की टट्टी लगी हुई थी और रेडियो पर धीमी धीमी आवाज़ में अल्ला जिलाई बाई का गाया लोक गीत बज रहा था थांने पंखियो झलाऊं सारी रैन जी म्हारा मीठा मारू.

बीकानेर में रेडियो स्टेशन साल 1962 में खुल गया था. घर में रेडियो तभी आ गया था मगर रेडियो उन दिनों ड्राइंग रूम की शोभा हुआ करता था. सब लोग उसके चारों तरफ बैठकर ज़ाहिर है, घर के बड़ों की पसंद के प्रोग्राम सुना करते थे. रेडियो पर प्रोग्राम भी चलते रहते थे और गपशप भी. कभी ताऊजी या मामा जी आ जाते थी या पिताजी के मित्रों की मंडली जम जाती थी तो हम बच्चों को वहां से हटना पड़ता था. शायद बड़ों को लगता था कि चाहे हम बच्चे पास न बैठे हों गाने तो दूर तक भी सुनाई देते ही थे. इसलिए उन्हें ऐसा कुछ भी नहीं लगता था कि रेडियो सुनने के हमारे अधिकार को वो हमसे छीन रहे हैं क्योंकि बाकी लोगों के लिए रेडियो फ़िल्मी गाने सुनने का साधन मात्र था.

दो बातें थीं जो मुझे बहुत परेशान करती थीं. दरअसल मेरे पास एक बैंजो था, जो भाई साहब के छठी कक्षा में अव्वल आने पर पिताजी ने उन्हें बतौर ईनाम दिलवाया था. उन्होंने तो दो चार दिन उसे बजाने की कोशिश कर के रख दिया था मगर मुझे वो बहुत आकर्षित करता था. एक दिन भाई साहब से डरते डरते पूछा आप तो इसे बजाते नहीं हैं, क्या मैं इसे बजाने की कोशिश करुं?

वो बोले, हां मुझसे तो नहीं बज रहा है ये, तुम कोशिश करके देख लो. मैं रेडियो के पास बैठकर गानों के साथ साथ बैंजो पर सुर मिलाने की कोशिश करता था. जब लोग आस पास बैठे होते तो मेरी ये साधना नहीं हो सकती थी क्योंकि इस काम में एकाग्रता की ज़रूरत होती थी और भीड़ में मैं फोकस नहीं कर पाता था. मेरी दूसरी परेशानी ये थी कि मुझे फ़िल्मी गाने सुनने में जितना आनंद आता था. उस से कहीं ज्यादा मजा रेडियो नाटक सुनने में आता था. जब भी रेडियो पर नाटक सुनने का मौक़ा मिलता था. मेरी इमेजिनेशन के सारे दरवाज़े खुल जाते थे और मैं दूसरी ही दुनिया में पहुंच जाता था.

मगर दुर्भाग्य से घर में न जाने क्यों और किसी को भी रेडियो नाटक सुनने में कोई रुचि नहीं थी. इसलिए अगर कभी मैं रेडियो पर कोई नाटक लगा कर सुनने की कोशिश करता तो कोई न कोई स्टेशन बदल देता और मुझे नाटक की उस खूबसूरत दुनिया से बाहर आना पड़ता. ये दोनों ही समस्याएं ऐसी थीं, जिसका एक ही हल था कि मेरे पास अपना एक अलग रेडियो हो जिसपर मैं जब चाहूं अकेला बैठकर नाटक सुन सकूं और जब चाहूं. उस पर संगीत चलाकर उसके साथ बैंजो बजा सकूं. लेकिन जब बीस-तीस घरों में से किसी एक घर में रेडियो हो तो मुझ जैसे सातवीं आठवी कक्षा के छात्र के पास एक अलग रेडियो हो, ये शायद सपने में ही संभव था.

हरि घर के अंदर आया और आते ही बड़े उत्साह के साथ बोला, एक चीज़ लाया हूं. तू देखेगा तो खुश हो जाएगा. मैंने कहा, अरे भायला (दोस्त), इतनी गर्मी में आया है. पहले पानी तो पी ले. मेरे साथ दो निवाले रोटी के खा ले फिर देख लूंगा कि तू क्या लाया है. दरअसल हरि डाक टिकिट इकट्ठे करता था इसलिए मैंने सोचा शायद कोई अच्छा डाक टिकिट लाया होगा दिखाने, जिसमें मुझे कोई खास रुचि नहीं थी. मगर उसने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया और बोला- दो तार के टुकड़े लेकर आ. फिर दिखाता हूं तुझे कि मैं क्या लाया हूं.

अब मुझे लगा कि शायद बात वो नहीं है जो मैं समझ रहा था. मैं उठा और दो तार के टुकड़े लेकर आ गया. अब हरि ने अपनी जेब से काले रंग का एक हैडफोन निकाला जो किसी फोन का एक हिस्सा लग रहा था. उसके पीछे की तरफ दो स्क्रू से निकले हुए थे. तार के दोनों टुकड़े उन स्क्रूज पर लपेटे गए. एक तार को एरियल के तौर पर ऊंचा टांग दिया गया और दूसरे तार के टुकड़े का एक सिरा हरि ने मेरे मुंह में डाल दिया. उस हैडफोन में कुछ कम्पन्न सी होने लगी तो हरि ने उसे मेरे कान से लगा दिया. उसमें बहुत ही साफ़ साफ़ आवाज़ में गाने आ रहे थे. हरि बोला- घर में बिजली न हो. तब भी आकाशवाणी, बीकानेर इसमें जब तक स्टेशन चालू रहे सुना जा सकता है. प्रभु रेडियो पर पांच रुपये में हैडफोन मिलता है और उसमें दो रुपये का एक क्रिस्टल लगवाना पड़ता है.

उसी शाम अपनी गुल्लक को तोड़ा तो देखा उसमें आठ रुपये चार आने जमा थे. अपने उस बैंक को खाली करते हुए मुझे ज़रा भी अफ़सोस नहीं हुआ क्योंकि मुझे लगा. इसके बाद मेरी दुनिया बदल जाने वाली थी. मैंने प्रभु रेडियो से हैडफोन खरीद कर उसमें क्रिस्टल लगवाया और घर आकर अपने कमरे में उसे अच्छी तरह फिक्स कर दिया. मेरा कमरा ऊपर की मंजिल पर था.

एरियल के तार को खिड़की में से निकाल कर सबसे ऊपर लगी लाइट के छोटे से पोल से बांध दिया. अब मेरे पास मेरा खुद का पर्सनल रेडियो था. अब मैं जब चाहूं. संगीत के साथ बैंजो बजा सकता था और अब मुझे रेडियो नाटक सुनने से कोई नहीं रोक सकता था.

'सालों तक साथ रहा 7 रुपये वाला मेरा रेडियो'

179
शेयर्स

पेश है दी लल्लनटॉप की नई सीरीज रेडियो जुबानी की दूसरी किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ाएंगे. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.

पहली किस्त में आपने पढ़ा- छोटे से बच्चे ने रेडियो के लिए अपनी गुल्लक तोड़ी. अब पढ़िए बच्चे के साथ उस रेडियो के आगे के सालों की कहानी.


 

उस ज़माने में राजस्थान में कहने को पांच रेडियो स्टेशन हुआ करते थे. जिनमें से एक अजमेर में सिर्फ ट्रांसमीटर लगा हुआ था. जो पूरे वक्त जयपुर से जुड़ा रहता था. मुख्य स्टेशन जयपुर था और बाकी स्टेशन यानी जोधपुर, बीकानेर और उदयपुर केन्द्रीय समाचार दिल्ली से रिले करते थे. प्रादेशिक समाचार जयपुर से और कुछ प्रोग्राम के टेप्स जयपुर से आते थे, उन्हें ही प्रसारित कर दिया जाता था.

कुछ प्रोग्राम जिनमें ज़्यादातर फ़िल्मी गाने बजाए जाते थे. अपने अपने स्टूडियो से प्रसारित करते थे. मुझे इस से कोई मतलब नहीं था कि कौन सा प्रोग्राम कहीं और से रिले किया जाता है और कौन सा बीकानेर के स्टूडियो से प्रसारित होता है. मैं तो अपने मालिये (छत पर बने कमरे) में बैठा अपने उस छोटे से रेडियो को कानों से लगाए हर वक्त रेडियो सुनने में मगन रहता था. जब भी संगीत का कोई प्रोग्राम आता तो मैं बैंजो निकालकर उसके साथ संगत करने लगता. उस वक्त मुझे इस बात का ज़रा भी आभास नहीं था कि खेल खेल में की गई, ये संगत आगे जाकर हर उस स्टेशन पर मेरे साथियों के बीच मुझे एक अलग पोजिशन दिलवाएगी.

हर बुधवार और शुक्रवार को रात में नाटक आया करता था जिसे मैं किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ सकता था. रविवार को दिन में पन्द्रह मिनट की झलकी आती थी और महीने में एक बार रात में नाटकों का अखिल भारतीय कार्यक्रम. ये सभी कार्यक्रम मेरे सात रुपये के उस नन्हें से रेडियो ने बरसों तक मुझे सुनवाए. उन दिनों जयपुर केंद्र से नाटकों में जो आवाजें सुनाई देती थीं. उनमें नन्द लाल शर्मा, घनश्याम शर्मा, गणपत लाल डांगी, देवेन्द्र मल्होत्रा, गोरधन असरानी (आगे चलकर फिल्मों के प्रसिद्ध कलाकार बने असरानी), माया इसरानी, सुलतान सिंह, लता गुप्ता नाम शामिल थे.

इन सब कलाकारों के इतने नाटक मैंने सुने कि सबकी अलग अलग तस्वीरें मेरे जेहन में बन गईं. वो तस्वीरें इस क़दर पक्की हो गईं कि 22-23 बरस बाद साल 1985 में जब मैं नाटकों के अखिल भारतीय कार्यक्रम के एक नाटक में भाग लेने के लिए इलाहाबाद से दिल्ली आया और नंद लाल को पहली बार देखा, तो मैं मानने को ही तैयार नहीं हुआ कि मेरे सामने खड़े सज्जन नंद लाल जी हैं क्योंकि मेरे तसव्वुर के नंद लाल तो लंबे चौड़े बहुत स्मार्ट से नौजवान थे. मगर जो सज्जन मेरे सामने स्टूडियो में खड़े थे वो तो छोटे से कद के, मोटे शीशे का चश्मा लगाए अधेड उम्र के थे. उस दिन मेरे दिल-ओ-दिमाग में बनी एक शानदार तस्वीर चकनाचूर हो गई थी, मगर फिर सोचा, कितना बड़ा है ये कलाकार जिसने अपने अभिनय से मेरे जेहन में इतनी कद्दावर तस्वीर उकेर दी.

मैं उनके कदमों में झुक गया था, श्रद्धा से सराबोर. खैर ये बात आगे चलकर पूरी करुंगा. तो इन सभी कलाकारों के नाटक सुनते सुनते पता नहीं कब नाटक का एक बीज मेरे भीतर भी फूट पड़ा. कहते हैं आप चाहकर भी किसी को कलाकार बना नहीं सकते. कला का बीज तो हर कलाकार में जन्म से ही होता है. जब भी उसे सही माहौल मिलता है वो बीज अंकुरित होने लगता है. नाटक करने की कितनी क्षमता मुझमें रही है इसका आकलन तो मैं खुद नहीं कर सकता मगर नाटक करने का शौक़ मुझे बचपन में उस वक्त से रहा है, जब मुझे पता भी नहीं था कि जो मैं कर रहा हूं, उसे नाटक कहते हैं.

मुझे याद आ रहा है एक ऐसा ही किस्सा. बात उस वक्त की है जब मेरी उम्र थी चार साल. मेरी मौसी उज्जैन से आए हुई थीं. सब साथ में बैठे थे. मैं जो कि अपनी मौसी के बहुत मुंह लगा हुआ था. वहां खूब शैतानियां कर रहा था. सभी लोगों ने मुझे शैतानियां न करने के लिए कहा लेकिन मुझ पर कोई असर नहीं हुआ. मैंने अपनी मस्ती चालू रखी. जब सब लोग तंग हो गए तो मेरी मौसी जी ने आख़िरी हथियार का इस्तेमाल किया. वो बोलीं देख महेन्द्र, अब भी तू नहीं मानेगा तो मुझे तेरी शिकायत जीजा (मेरे पिताजी) से करनी होगी.

लेकिन मैं शैतानी करने से फिर भी बाज़ नहीं आया क्योंकि मैं मान ही नहीं सकता था कि मेरी इतनी प्यारी मौसी जी मेरी शिकायत पिताजी से कर सकती हैं. जब मैं किसी भी तरह काबू में नहीं आया तो मौसी जी उठीं और अंदर की तरफ जिधर के कमरे में पिताजी बैठे हुए थे चली गईं. दो मिनट बाद लौटकर आईं और बोलीं महेन्द्र , जा तुझे जीजा जी बुला रहे हैं.

मुझे अंदाजा हो गया कि वो मुझे बेवकूफ बना रही हैं, उन्होंने मेरी शिकायत हरगिज़ नहीं की है. मैं उठा. अंदर आंगन के चार चक्कर लगाए और रोता हुआ वापस उस कमरे में आ गया जहां मौसी जी वगैरह बैठे थे. मैं सिर्फ नकली रोना चाह रहा था मगर न जाने कैसे नकली रोते रोते सचमुच मेरी आंखों में आंसू आ गए. मौसी जी घबराईं. बोलीं- अरे क्या हुआ? क्यों रो रहे हो?

मैं रोते रोते बोला- पहले तो मेरी शिकायत पिताजी से करके डांट पड़वा दी और अब पूछ रही हैं क्यों रो रहे हो.? उन्होंने मुझे गोद में लिया और बोलीं- लेकिन बेटा न तो मैं उनके पास गई और न ही तुम्हारी शिकायत की. मैं तो वैसे ही आंगन में चक्कर लगा कर आ गई थी. मेरी आंखें तो अब भी आंसुओं से भरी हुई थीं. मगर मुझे जोर सी हंसी आ गई और मैंने कहा, तो मैं कौन सा उनके पास गया था? मैं भी आंगन में चक्कर लगाकर लौट आया था.

इस पर वो बोलीं, अरे राम, फिर ये इतने बड़े बड़े आंसू? ये कैसे आ गए तुम्हारी आंखों में. इसका मेरे पास भी कोई जवाब नहीं था. क्योंकि मुझे खुद पता नहीं लगा कि रोने का अभिनय करते करते कब मेरी आंखों में सचमुच के आंसू आ गए.

शायद ये मेरी ज़िंदगी का पहला मौक़ा था जब मैंने सफलतापूर्वक नाटक किया था. उस वक्त मेरी उम्र महज़ चार साल थी. मुझे कहां समझ थी कि मैंने किया. उसे नाटक कहते हैं और आगे जाकर ये नाटक मुझे ज़िंदगी के कितने कितने रंग दिखाएगा?

'कंजूसी कर 6 महीने चलानी पड़ती थी रेडियो की बैटरी'

91
शेयर्स

पेश है दी लल्लनटॉप की नई सीरीज रेडियो जुबानी की तीसरी किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ाएंगे. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.

पहली और दूसरी किस्त में आपने छोटे से बच्चे की रेडियो के लिए शुरुआती दीवानगी पढ़ी. अब पढ़िए कि रेडियो की बैटरी महीनों तक चलाने के लिए उसे कैसे कंजूसी करनी पड़ती थी.


देश के आज़ाद होने से कुछ ही साल बाद मेरा जन्म हुआ था. यानि मेरा और आज़ाद भारत का बचपन साथ साथ गुज़रा. तब तक मेरे पिताजी पुलिस की नौकरी छोड़ चुके थे. यूं तो उनकी श्री गंगानगर की पोस्टिंग भी मुझे याद है जब हम आसकरण बहनोई और रामभंवरी बाई के साथ एक ही घर में रहते थे. घर में कुल तीन कमरे थे. एक में मैं, मेरे भाई साहब, मेरे पिताजी और मां, हम चारों रहते थे और एक कमरे में जीजाजी और बाई अपनी पांच लड़कियों के साथ. तीसरा कमरा बैठक कहलाता था जिसे हम सब काम में लेते थे मगर मुझे उनकी जो पहली पोस्टिंग बहुत अच्छी तरह याद है, वो है श्री गंगानगर जिले के चूनावढ गांव की.

राजस्थान सरकार ने ग्रामीण उत्थान के लिए एक योजना शुरू की थी, जिसके अंतर्गत गांवों में एक दफ्तर खोला जाता था जिसे ग्राम सुधार केंद्र कहा जाता था. पिताजी चूनावढ के ग्राम सुधार केंद्र के प्रभारी थे. एक पुरानी मगर बड़ी सी मस्जिद में उनका दफ्तर था. जो शायद पार्टीशन के वक्त उजड़ गई थी और मस्जिद से लगे हुए एक छोटे से कच्चे घर में हम लोग रहा करते थे. घर और दफ्तर के बीच एक दरवाज़ा लगा हुआ था. यानि घर और दफ्तर एक ही था. पिताजी के दफ्तर में मेरी रुचि की तीन ऐसी चीज़ें मौजूद थीं जो अक्सर मुझे वहां खींच ले जाती थीं.

रेडियो, ग्रामोफोन और कैमरा. कैमरा छूने की हमें इजाज़त नहीं थी. हालांकि दिल बहुत करता था उसे छूने का. फोटो खींचने का मगर खैर हमारे लिए बाकी दोनों चीज़ों को छूने की इजाज़त भी कम नहीं थी. जूथिका रॉय, पहाड़ी सान्याल, जोहरा बाई अम्बालावाली, अमीर बाई कर्नाटकी, कुंदन लाल सहगल, पंकज मलिक, मास्टर गनी, ललिता बाई आदि के बहुत से रिकॉर्ड्स वहां मौजूद थे. संगीत से मेरा पहला परिचय था ये. रेडियो से मेरी दोस्ती की शुरुआत भी यहीं हुई और कैमरा भी पहली बार मैंने यहीं देखा. मैं कहां जानता था उस वक्त कि ये तीनों ही मेरी ज़िंदगी के अटूट हिस्से बन जाएंगे.

उस गांव में एक शानदार नहर थी, जिसका पानी पीने से लेकर सिंचाई तक सब कामों के लिए था लेकिन ये नहर महीने में तीसों दिन चालू नहीं रहती थी इसलिए गांव में जगह जगह पक्की डिग्गियां बनी हुई थीं, जिनमें घरेलू ज़रूरतों के लिए पानी जमा कर लिया जाता था और लोग अपनी अपनी ज़रूरत का पानी रस्से और बाल्टी की मदद से निकाल लिया करते थे.

और हां एक बात तो मैं बताना ही भूल गया, चूनावढ में बिजली नहीं थी. आप सोच रहे होंगे कि फिर रेडियो कैसे बजता था? आपका सोचना सही है, उस वक्त तक ट्रांजिस्टर का आविष्कार भी नहीं हुआ था. कार में जो बैटरी लगती है, उस से थोड़ी छोटी EVEREADY की लाल रंग की एक बैटरी आया करती थी, जिसमें रेडियो का प्लग लगाया जाता था और लगभग 15 फीट लंबा जालीदार एरियल रेडियो से जोड़ दिया जाता था तब जाकर बजता था रेडियो.

हर शाम मस्जिद यानि दफ्तर के आंगन में गांव के लोग इकठ्ठे होते थे और उन्हें रेडियो पर समाचार, संगीत और खेती बाडी के कार्यक्रम सुनवाए जाते थे. बाकी वक्त वैसे तो वो रेडियो हमारी पहुंच में रहता था. हम जब चाहे उसे बजा सकते थे मगर सबसे बड़ी दिक्कत थी बैटरी, जो कि श्री गंगानगर से लानी पड़ती थी. हमें उस बैटरी को 6 महीने चलाना होता था. इसलिए रेडियो सुनने में बहुत कंजूसी बरतनी पड़ती थी. पूरे गांव में उसी तरह का एक और रेडियो मौजूद था और वो था पिताजी के ही एक मित्र जोधा राम चाचा के घर में.

कभी कभी हम वहां जाकर भी रेडियो सुनते थे. मगर वहां दिक्कत ये होती थी कि चाचा सीलोन लगाते थे और उनका बेटा तुरंत विविध भारती की तरफ सुई घुमा देता था जो कि उन दिनों शुरू हुआ ही था. फिर जैसे ही चाचा का बस चलता, वो फिर सीलोन लगा दिया करते थे. इस तरह दिन भर रेडियो की सुई, सीलोन और विविध भारती के बीच घूमती रहती थी.

ग्रामोफोन हालांकि बैटरी से नहीं चलता था, उसमें थोड़ी थोड़ी देर में चाबी भरनी पड़ती थी मगर आज से 15-20 साल पहले के रिकॉर्ड प्लेयर की तरह उसमें डायमंड की नीडल नहीं लगी होती थी. उसमें मैटल की सुई लगती थी और एक सुई से बस दो रिकॉर्ड ही बज पाते थे. हर दो रिकॉर्ड के बाद घिसी हुई सुई को हटा कर नई सुई लगानी पड़ती थी. यहाँ भी वहीं संकट था, सुइयां खत्म हो गईं तो जब तक पिताजी श्री गंगानगर जाकर सुई की डिब्बियां नहीं लायेंगे तब तक ग्रामोफोन बंद. बड़ी किफायतशारी से काम लेते हुए हम लोग बारी बारी से अपनी पसंद के गाने सुना करते थे.

विविध भारती के अपने 12 बरस के कार्यकाल में जब भी मैं भूले बिसरे गीत सुना करता था, चूनावढ की ये तस्वीरें हर बार ज़िंदा होकर मेरे सामने आ खड़ी होती थीं और मैं आंखें बंद कर उसी वक्त में पहुँच जाता था. बीच के 45-50 बरस एक लम्हे में न जाने कहां गायब हो जाते थे. चूनावढ के दिनों में मुझे जूथिका रॉय का गाया मीरा का भजन घूंघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगेबहुत पसंद था.

मुझे जब भी अकेले ग्रामोफोन बजाने का मौक़ा मिलता था. मैं ये भजन सुनता और रिकॉर्ड के साथ गुनगुनाया करता था. पता नहीं सुर में गाता था या बेसुरा मगर एक रोज मैं रिकॉर्ड चलाकर उसके साथ यही भजन गा रहा था कि पिताजी कमरे में घुसने लगे, मुझे गाते सुनकर वो दरवाज़े के बाहर ही रुक गए. रिकॉर्ड खत्म होने लगा तो वो अंदर आये. मैं एकदम हडबडा गया मेरी उम्र छह साल रही होगी उस वक्त. मुझे लगा अब शायद डांट पड़ेगी, मगर पिताजी ने बहुत प्यार से मुझे पूछा तुम गा रहे थे?

मैंने डरते डरते हां में सर हिलाया. इस पर वो बोले डर क्यों रहे हो? ये तो अच्छी बात है. मेरी जान में जान आई. पिताजी थोडा बहुत हारमोनियम बजा लिया करते थे. कुछ ही दिन बाद उन्होंने एक हारमोनियम का इंतजाम किया और मुझे गाने का अभ्यास करवाने लगे.मेरा गाने का ये सिलसिला कॉलेज में पहुंचा तब तक जारी रहा. आप पूछेंगे, क्या उसके बाद ये सिलसिला रुक गया? जी हाँ, उसके बाद मैंने गाना बंद कर दिया. क्यों बंद कर दिया मैंने गाना इसका ज़िक्र मैं आगे चलकर करूंगा.

हां तो मैं बता रहा था कि जुथिका रॉय का गाया मीरा का भजन मुझे बहुत प्रिय था. सही पूछिए तो उसवक्त मुझे ये लगता था कि जो कलाकार ये भजन गा रही हैं वही मीरा हैं. चार साल पहले की बात है. मैं विविध भारती का प्रमुख था. एक रोज यही भजन विविध भारती से प्रसारित हो रहा था. मैं हमेशा की तरह आंखें बंद करके अपने बचपन में पहुंच गया. वही चूनावढ का कच्ची ईंटों का बना कमरा और उसमें बजता वही चाबी वाला ग्रामोफोन. थोड़ी देर में भजन तो ख़त्म हो गया मगर मैं दिन भर चूनावढ के उस कमरे से बाहर नहीं निकल पाया. ऑफिस में भी आंखें बंद किये उन्हीं बचपन की यादों में खोया था कि तभी फोन की घंटी बजी, मानो किसी ने झिन्झोड़कर मेरा सपना तोड़ दिया. मैंने थोडा सा झुंझलाकर फोन उठाया.

उधर से किसी सभ्य महिला ने नमस्कार के साथ एक ऐसी बात कही कि मैं उछल पड़ा. वो बोलीं- सर, एक बहुत पुरानी सिंगर कलकत्ता से आई हुई हूं, पता नहीं आपने उनका नाम सुना है या नहीं मगर वो विविध भारती आना चाहती हैं और आप चाहें तो उन्हें रिकॉर्ड भी कर सकते हैं.

मैंने कहा विविध भारती में सभी कलाकारों का स्वागत है, मगर नाम तो बताइये उनका. वो धीरे से बोलीं जूथिका रॉय. मुझे उछलना ही था. खैर, अगले दिन उन्हें विविध भारती में आमंत्रित किया गया.वो जब मेरे सामने आईं तो मैं एक बार फिर चूनावढ के अपने उस कच्चे कमरे में पहुंच गया, अपने बचपन की उंगली थामे .. मगर इस बार मेरे साथ सिर्फ वो चाबी वाला ग्रामोफोन ही नहीं था इस बार साक्षात् मीरा मेरे सामने बैठकर हारमोनियम हाथ में लिए गा रही थीं, घूंघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे . और मेरी आंखों से दो आंसू टपक गए.


'बारी आने पर जब बीकानेर को नहीं मिला गाना'

73
शेयर्स

पेश है दी लल्लनटॉप की नई सीरीज रेडियो जुबानी की चौथी किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ाएंगे. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.

पहली, दूसरी और तीसरी किस्त में आपने छोटे से बच्चे की रेडियो के लिए शुरुआती दीवानगी पढ़ी. अब पढ़िए कि जब महेंद्र मोदी को पहली बार रेडियो के लिए लिखने का मौका मिला.


 

पांचवीं क्लास तक मैं जिस स्कूल में पढ़ा, उसका नाम था राजकीय प्राथमिक पाठशाला नंबर-1. बहुत ही साधारण सा स्कूल था. अंग्रेज़ी के एबीसीडी अभी कोर्स में नहीं थे. हालांकि सभी गुरु लोग अंग्रेज़ी का नाम लेकर डराया करते थे कि अभी ये हाल है तो अगले साल छठी में क्या करोगे, जब अंग्रेज़ी पढनी पड़ेगी.

टाट पट्टी पर बैठना होता था अपने बराबर के बच्चों के साथ भी और अपने से बड़े बड़े चूहों के साथ भी. फर्श पर बड़े-बड़े गड्ढे थे और बड़ी बड़ी मूंछों वाले एक मास्टर जिनका नाम श्री किशन जी था. एक बड़ा सा डंडा हाथ में लेकर जब क्लास में अवतरित होते थे तो हम सब बच्चों के प्राण सूख जाते थे. कम से कम मुझे तो वो चूहे, वो गड्ढे, वो मूंछे और वो डंडा हर चीज़ बड़ी बड़ी सी लगती थी. घर में साल(अंदर का कमरा जिसे आज की भाषा में बैडरूम कह सकते हैं ) और ओरा ( साल के अंदर का कमरा जिसमें पूरे घर की संदूकें रहती थी, अनाज रहता था और वो सभी चीज़ें रहती थी जो रोज़मर्रा काम में आने वाली नहीं होती थीं) मुझे बचपन में बहुत बड़े बड़े लगा करते थे लेकिन अभी कुछ दिन पहले जब मैं बीकानेर गया, तो अपने पुराने मोहल्ले में जाकर उस घर को एक बार देखने को मन ललचा गया जिसमें मैंने आंखें खोली थीं.

फड बाज़ार का वो मोहल्ला जिसमें कभी हम खुलकर मारदडी(एक खेल जिसमें एक दूसरे को गेंद फेंक कर मारा जाता है) और सतोलिया (सात ठीकरी और एक गेंद से खेला जाने वाला एक खेल) खेला करते थे अब भीड़ भरे बाज़ार में बदल गया है. कार आधा किलोमीटर दूर हैड पोस्टऑफिस के पास खडी करके मैं किसी तरह पैदल पैदल अपने पुराने घर में पहुंचा जिसे हमने 1995 में लतीफ़ खान जी को बेच दिया था और उन्होंने उस पूरे घर को दुकान में बदल दिया था.

मैं अंदर पहुंचा तो वो साल और ओरा मुझे बहुत ही छोटे छोटे लगे, मुझे समझ नहीं आया कि बचपन के इतने बड़े बड़े साल और ओरा आखिर सिकुड़ कर इतने छोटे कैसे हो गए? मुझे एक बार को लगा, नहीं ये वो घर नहीं है जिसमें मैं पैदा हुआ बड़ा हुआ. 10-11 बरस की छोटी सी उम्र में मैं रसोई में बैठकर खाना बनाया करता था और मेरी मां आंगन में खाट पर लेटे लेटे मुझे खाना बनाना सिखाती रहती थीं क्योंकि वो बहुत बीमार रहने लगी थीं जब मैं छोटा सा ही था. ये इतना छोटा सा आंगन? नहीं ये वो घर नहीं हो सकता. मैं ऊपर अपने प्रिय मालिए में भी गया जिसमें बैठकर मै पढाई भी करता था और बैंजो पर रियाज़ भी करता था.

अरे ये तो बहुत ही छोटा सा कमरा है जबकि मेरे ज़ेहन में ये एक अच्छा बड़ा सा कमरा था. तब मैंने महसूस किया कि बचपन में चूंकि हम छोटे होते हैं हमें हर चीज़ बड़ी बड़ी लगती है और जब बड़े हो जाते हैं तो सभी चीज़ें छोटी लगने लगती हैं . मुझे वो बग्घी (विक्टोरिया) भी बहुत विशाल लगती थी, बिलकुल किसी राजा के सिंहासन की तरह, जो मेरे बड़े मामा राम चंद्र जी होली के दिन अपने क़ाफिले में लेकर आया करते थे और हम दोनों भाइयों को उस पर बिठा कर ले जाया करते थे . बड़ा लंबा काफिला हुआ करता था . आगे एक बग्घी और उसके पीछे कई तांगे.उन दिनों बीकानेर में कार तो शायद महाराजा करनी सिंह के पास हुआ करती थी और कुछ बड़े वणिक पुत्रों के पास. आम आदमी की सवारी थी तांगा और जो लोग थोड़े समृद्ध होते थे वो बग्घी पर आया जाया करते थे.

ये तो जब मैं 1973 में आकाशवाणी, मुम्बई में कार्यक्रम अधिशासी बनकर आया तो इन बग्घियों की, जिन्हें यहां की भाषा में विक्टोरिया कहा जाता था की दुर्दशा देखी. 50 पैसे में इसकी सवारी की जा सकती थी. तो होली के मौके पर उस बग्घी पर बड़े बड़े लाउड स्पीकर्स लगे रहते थे. मेरे मामा जी बहुत पढ़े लिखे नहीं थे ये मुझे उस वक्त पता लगा जब मैं काफी बड़ा हो गया. मैं तो उन्हें काफी विद्वान समझता था क्योंकि चाहे वो ज्यादा पढ़े लिखे न हों और एक सेठ के यहां मुनीम की नौकरी करते हों, मगर उनमें एक बहोत बड़ा गुण था. वो आशुकवि थे. खड़े खड़े किसी पर भी कविता कर देते थे और वो इतनी सटीक हुआ करती थी कि लोग दांतों तले अंगुली दबाने लगते. उनका गला भी इतना सुरीला था कि जब वो गाते तो लोग जस के तस खड़े रह जाते. एक बात और बताऊं, हंसेंगे तो नहीं न.? वो मुझे प्यार से चीनिया (चीनी) पुकारते थे क्योंकि मैं बचपन में ज़रा गोल मटोल था और मेरी आंखें छोटी छोटी थीं.

आप सोच रहे होंगे कि मैं यहां अपने मामाजी का बखान क्यों कर रहा हूं. मगर उसका एक कारण है जो अभी आपको समझ में आ जाएगा. उन दिनों बीकानेर में होली का त्यौहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता था . होली से 15 दिन पहले लोग अपने चंग(बड़े बड़े डफ) निकाल लेते थे और हर गली कूचे में चंग और मजीरों के साथ कुछ सुरीली आवाजें गूंजने लगती थीं हमैं रुत आई रे पपैया थारै बोलण री रुत आई रे ढमक ढमक टक ढमक ढमक . गीत बहुत से हुआ करते थे. लोग शराब या भंग पीकर अश्लील गीत भी गाया करते थे,ज़्यादातर के अर्थ भी मुझे समझ नहीं आते थे मगर चंग की ढमक ढमक और ऊंचे सुर में ली हुई टेर दिल के अंदर तक उतर जाती थी.

जैसे जैसे होली नज़दीक आती ये गीतों का रंग और गहरा होता जाता और पूरा बीकानेर शहर चंग, मजीरों और गीतों के सागर में डूबने लगता. आखिरकार होली खेलने का दिन आ जाता. यों तो बिना किसी जाति-धर्म के भेदभाव के सभी लोग फाग गाते और फाग खेलते मगर शहर के परकोटे के अंदर पुष्करणा ब्राह्मणों के दो समुदायों की होली दूर दूर से लोग देखने आते थे. चौक में दोनों ओर चंग, मजीरों, डोल्चियों, रंग से भरे बड़े बड़े टबों से सुसज्जित हर्षों और व्यासों के दो समूह जिन्हें बीकानेर की भाषा में गैर कहा जाता है और चौक के चारों ओर घरों की मुंडेरों पर औरतों के समूह के समूह. एक प्यार भरा संगीतमय युद्ध शुरू होता था जिसमें एक दूसरे पर रंग की बौछारें भी की जाती थीं और साथ ही स्नेह से सराबोर संगीतमय गालियों के तीर भी छोड़े जाते थे.

हालांकि मैंने इस अद्भुत युद्ध के बारे में सिर्फ पढ़ा है या फिर सुना है, इसे साक्षात देखा नहीं पर अब भी दिल के किसी कोने में ये इच्छा है कि इसका साक्षी बनूँ, पता नहीं अब ये वैसा होता भी है या बाकी त्योहारों की तरह इसकी भी बस लोग तकमील ही पूरी करके रह जाते हैं. हम लोगों के लिए भी ये दिन बहुत खास हुआ करता था. इस दिन मामाजी एक सजी धजी बग्घी पर लाउड स्पीकर्स लगाए, अपने पीछे पीछे तांगों का लंबा सा क़ाफ़िला लिए अपने बनाए हुए गीत गाते हुए हमारे घर आते थे और आवाज़ देते चीनियाआआअ. हम लोग दौडकर उनके पास पहुंच जाते.वो मुझे और भाई साहब को बग्घी में बिठाकर ले जाते थे. मैं जब उनके गीत सुनता था तो मुझे बहुत अच्छा लगता था और मैं सोचता था कैसे लिख लेते हैं ये इतने सुन्दर गीत?

मुझे नहीं पता था उस वक्त कि जीन्स क्या होते हैं और जीन्स के ज़रिये कोई गुण एक पीढ़ी अनजाने में ही दूसरी पीढ़ी को कैसे सौंप देती है? इसका थोड़ा एहसास हुआ जब मैं आकाशवाणी, बीकानेर में था, इस मास का गीत रिकॉर्ड करने की बीकानेर की बारी थी और कोई गीत नहीं मिल रहा था. हमारे कार्यक्रम अधिशासी महेंद्र भट्ट(ग्रेमी अवॉर्ड विजेता पंडित विश्व मोहन भट्ट के बड़े भाई) जो कि एक ही नाम होने के कारण मुझे मीता बुलाते थे.

मुझसे बोले, मीता, एक गीत लिखोगे. मैंने कहा, जी मैं?. तो वो बोले- हां, मुझे पता है तुम लिख लोगे. मेरे पास कुछ जवाब था ही नहीं. मैंने कहा- जी कोशिश करता हूं. अपने साथी भाई चंचल हर्ष जी की मदद लेकर एक टूटा फूटा गीत लिखा था मैंने ज़िंदगी अब है सज़ा जीना हुआ मुहाल है, मौत भी आती नहीं किस्मत का ये कमाल है.

एक समय में संगीतकार मदन मोहन के सहायक रहे स्वर्गीय डी. एस. रेड्डी ने धुन बनाई. स्वर्गीय दयाल पंवार( संगीतकार पंडित शिवराम के सहायक)ने रेड्डी जी के सहायक के तौर पर काम किया और स्वर्गीय बदरुद्दीन ने गाया इसे. इन सभी के साथ साथ स्वर्गीय जसकरण गोस्वामी (सितारवादक),स्वर्गीय मुंशी खान (सितारवादक)और स्वर्गीय इकरामुद्दीन खान (तानपूरावादक) के प्रति इस माध्यम से मेरी स्नेह्पूरित श्रद्धांजलि. जीन्स के ज़रिये ये गुण आगे बढते हैं इस पर विश्वास पक्का हुआ जब मेरे बेटे वैभव ने जस्सी जैसा कोई नहीं,काजल,रिहाई,ये मेरी लाइफ है वगैरह वगैरह बीसियों टी वी धारावाहिकों और द्रोण, चल चला चल और नाइन्टी नाइन जैसी फिल्मों में गाने लिखे.

मगर इस सबके बीच मैं आज भी आकाशवाणी, इलाहाबाद के किसी ज़माने में मशहूर रहे गायक प्रणव कुमार मुखर्जी को नहीं भूल सकता, जिन्होंने बात ही बात में मुझसे न जाने कितनी ग़ज़लें कहलवा लीं मगर अफ़सोस अब न प्रणव रहे और न ही

'जब नाटक में रोई तवायफ का रोल प्ले करती बच्ची'

70
शेयर्स

पेश है दी लल्लनटॉप की नई सीरीज रेडियो जुबानी की 5वीं किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.

पहलीदूसरीतीसरी और चौथी किस्त में आपने छोटे से बच्चे की रेडियो के लिए शुरुआती दीवानगी पढ़ी. अब पढ़िए कि जब बड़े भाई को थप्पड़ मारने का किस्सा सालों बाद बना रेडियो नाटक का हिस्सा.


 

नाटक हर इंसान की. नहीं, शायद इंसान ही नहीं, हर प्राणीकी ज़िंदगी का एक ज़रूरी हिस्सा होता है. आपने देखा होगा कुत्ते अक्सर आपस में खेलते हैं. एक दूसरे को काटने का अभिनय करते हैं. मगर चोट नहीं पहुंचाते. आपका पालतू कुत्ता जब आपके साथ खेलना चाहता है तो आपके सामने आकर भौंकने लगता है. भौंकने के साथ साथ उसकी पूंछ हिलती है तो आप समझ जाते हैं कि वो वास्तव में नाराज़ होकर नहीं भौंक रहा बल्कि आपके साथ खेलना चाहता है और आप भी उसकी भाषा समझकर ज़रा सा नाटक करते हैं यानी उठने का अभिनय करते हैं तो वो दौड़ पड़ता है ताकि आप उसके पीछे दौड लगाएं और आप दौड़ते हैं.

कभी आप उसके पीछे और कभी वो आपके पीछे और जब भी मौका मिलता है, वो आपको काटने का नाटक करने लगता है. ये खेल इसी तरह चलता रहता है जब तक कि आप थक कर बैठ नहीं जाते. तब वो आपके पास आकर आपको काटने का नाटक करने लगता है और फिर आपकी गोद में लोटने लगता है.

मैं जब भी बीकानेर जाता हूं. मेरी जर्मन शेफर्ड शैरी बड़े लाड प्यार से मुझसे मिलती है. आकर लिपट जाती है और काफी समय तक छोड़ती ही नहीं. वो पलंग के उसी तरफ बैठती है जिधर मैं लेटता हूं. भाभी शैरी को उलाहना भी देती हैं कि वो मौक़ापरस्त है. मेरे वहां जाने के बाद वो उनके पास नहीं जाती है. मेरे पास ज्यादा रहती है. मेरे वहां जाने के बाद वो दूध रोटी खाना बिल्कुल छोड़ देती है. मैं जानता हूं, उसे मछली बहुत पसंद है और जब भी मैं वहां जाता हूं, चाहे कुछ भी हो जाए. उसे मछली लाकर ज़रूर खिलाता हूं जोकि भाई साहब नहीं कर पाते.

मेरे पास आकर वो ज़ोर ज़ोर से भौंकने लगती है मानो कह रही हो, मुझे मछली खिलाओ. मगर वो भौंकना बहुत प्यार भरा होता है और साफ़ लगता है कि वो नाटक कर रही हैं क्योंकि भौंकने के साथ साथ पूंछ हिलाती जाती है. मेरे भाई साहब जो कि एक डॉक्टर हैं हमेशा कहा करते हैं कि जिस प्राणी में जितना ज़्यादा ग्रे मैटर होता है उसमें उतनी ही ज़्यादा बुद्धि होती है. तो इस हिसाब से इंसान के एक बच्चे में भी कुत्ते से ज़्यादा अक्ल होती है और जिसमें जितनी ज़्यादा अक्ल होती है वो उतना ही ज़्यादा नाटक कर सकता है.

आप ये न समझें कि मैं नाटक वालों को ज़्यादा बुद्धिमान साबित करने की कोशिश कर रहा हूं. मैं तो सिर्फ नाटक की जो सबसे छोटी और सरल परिभाषा है उसकी बात कर रहा हूं. आप जब वो बनते हैं जो आप नहीं हैं तो आप नाटक करते हैं. मैं बस यही कहना चाहता हूं. आज भी मेरा पोता टाइगर कभी कभी कहता है दादू आप स्टूडेंट हैं और मैं टीचर तो मुझे स्टूडेंट बनना पड़ता है या फिर मेरी नातिन नैना मेरी मां बनकर खाना परोसती है तो मुझे झूठमूठ ही वो खाना खाना होता है जो प्लेट में कहीं नहीं होता.

आपने भी देखा होगा कि अक्सर लडकियां दुपट्टे को साड़ी की तरह पहनकर घर घर खेलती हैं. खाना बनाती हैं और बच्चों को धमकाती हैं फिर प्यार से समझाती हैं. आज, टीवी, कंप्यूटर और वीडियो गेम्स, न जाने क्या क्या है, जिन्होंने इन सब खेलों से बच्चों को बहुत दूर कर दिया है. मेरा पोता टाइगर आई पैड पर तरह तरह के खेल खेलता है मगर फिर भी मुझे लगता है, मेरा टीचर बनने में जो सुख उसे मिलता है वो उस आई पैड में उसे कतई नहीं मिलता होगा.

मेरा मोहल्ला शेखों का मोहल्ला कहलाता था और इन शेखों के साथ हम लोगों के खेलने खाने के सम्बन्ध नहीं हुआ करते थे. इन लोगों को बस हमारे घर की देहरी तक ही आने की इजाज़त थी. मेरे पड़ोस में कुंदन भाई का घर था. उससे बिल्कुल जुड़ा हुआ सोहन बाबो जी का घर था. जो मेरे पिताजी की मौसी के बेटे थे. सोहन बाबोजी की एक ही औलाद थी, पूनम भाई जी. बहुत रोचक कैरेक्टर थे वो.

1993 में जब मैं उदयपुर में पोस्टेड था. एक साप्ताहिक हास्य धारावाहिक शुरू किया था मैंने. वैसे तो इस धारावाहिक को मेरे साथी कुलविंदर सिंह कंग लिखा करते थे मगर कुछ एपिसोड्स मैंने भी लिखे. उस धारावाहिक का एक चरित्र मैंने दो लोगों को मिलाकर गढा. एक मेरा छात्र सत्यप्रकाश और दूसरे पूनम भाई जी. इन दोनों का विस्तार से ज़िक्र तब आएगा जब मैं उदयपुर की बात करुंगा. मेरे दूसरे ताऊ जी दीना नाथ जी थे, जिनको हम सब बा कहते थे.

उनका घर हमारे घर से थोड़ा सा दूर, सड़क के उस पार था. वो मेरे पिताजी के मामा के बेटे थे. बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, जब मेरे पिताजी सिर्फ पौने दो साल के थे. मेरे परिवार में एक बहुत बड़ी दुर्घटना हो गई थी. मेरे दादा जी और उनके दस बच्चे, पूरे देश में तबाही मचाने वाली प्लेग की बीमारी में, चार दिनों में श्मशान घाट पहुंच गए थे. यानि एक झटके में एक भरा पूरा घर खाली हो गया था. घर में बच गई थीं मेरी दादी. अपनी गोद में पौने दो साल का एक बच्चा लिए हुए.

मेरे दादाजी की सारी ज़मीन जायदाद, सोना चांदी, मेरे दादा जी के क़रीबी रिश्तेदार खा गए. ऐसे वक्त में मेरे पिताजी के मामा जी, मेरी दादी जी और मेरे पिताजी को अपने घर ले गए और भाई बहन दोनों ने मिलकर पिताजी और बा दोनों को पाला पोसा. क्योंकि बा की मां की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी. इस प्रकार मेरे पिताजी और बा की परवरिश एक साथ हुई. नतीजा, जब तक वो ज़िंदा रहे, दोनों में सगे भाइयों से भी ज़्यादा प्यार रहा.

बा बहुत पढ़े लिखे थे. उस ज़माने में स्कूल में हैड मास्टर ही सबसे बड़ी पोस्ट हुआ करती थी और वो एक हैड मास्टर थे. कई किताबें लिखी थी उन्होंने. आज भी बीकानेर के इतिहास पर, उनकी और नरोत्तम दास स्वामी की लिखी किताब, एक प्रामाणिक किताब मानी जाती है. उनकी एक बहुत बड़ी सी लाइब्रेरी थी. इसी लाइब्रेरी की कुछ किताबें 1981 में मैंने अपनी ताई जी से लेकर अपने स्टेशन डायरेक्टर श्री उमेश दीक्षित को दी थी.

ये लायब्रेरी कैसे बाद में जाकर दहीबडों और कचौरियों में बदल गयी ये मैं सूरतगढ़ वाले एपिसोड्स में लिखूंगा. हां तो मैं बता रहा था बा के बारे में. उनकी पोस्टिंग अक्सर बीकानेर से बाहर के स्कूलों में रहती थी. छुट्टियों में जब डेढ़ महीने के लिए वो बीकानेर आते थे तो मेरे लिए वो साल का सबसे सुनहरा वक्त होता था. उनके आठ बच्चे थे, पांच लड़के और तीन लडकियां. चार लड़के मुझसे बहुत बड़े थे मगर एक लड़का रतन और तीन लड़कियां विमला, निर्मला और मग्घा मेरे हमउम्र थे क्योंकि इन सबकी उम्र में एक-एक साल का अंतर रहा होगा.

जब भी छुट्टियों में वो बीकानेर आते थे. बस हम पांचों लोग दिन रात साथ ही रहते थे. कई बार इस बात के लिए मुझे और उन लोगों को डांट भी पड़ती थी, मगर हम लोग उस डाट को सह लेते थे और साथ साथ ही रहते थे. मेरे घर की छत पर एक टूटा हुआ पलंग था और एक टूटी हुई तीन पहियों की साइकिल. टूटी हुई साइकिल को पलंग में कुछ इस तरह फंसा लिया जाता था कि साइकिल का पहिया स्टीयरिंग की तरह लगने लगता था और बस हमारी शानदार गाड़ी तैयार. सच बता रहा हूं.

जो थ्रिल बचपन में उस टूटे पलंग और टूटी साइकिल से बनी गाड़ी को चलाने में महसूस होता था, आज अपने घर में मौजूद कैप्टिवा से लेकर स्विफ्ट तक किसी को भी चलाने में नहीं होता . हम अपनी उस शानदार गाड़ी में सवार होकर निकल पड़ते थे. शिकार के लिए वो ज़माना था, जब शिकार एक ज़रूरी हिस्सा हुआ करता था, राजाओं और राजकुमारों के जीवन का. बस कल्पना में हम सभी राजकुमार और राजकुमारियां घने जंगल में पहुंच जाते थे. जंगल में कभी सामने शेर आता था और कभी हिरन. यही नाटक घंटों चलता रहता था और हम कई शेरों और कई हिरणों का शिकार करके अपनी उस शानदार गाड़ी में लाद कर घर लौटते थे चाहे लौटकर कितनी भी डांट पड़े. क्या था ये सब? एक नाटक ही तो था न?

इस मौके पर एक नाटक और याद आ रहा है मुझे. बहुत छोटा था मैं शायद 3-4 साल का. हम लोग चूनावढ में रहते थे. जिसका ज़िक्र मैं पहले एक एपिसोड में कर चुका हूं. मैं और मेरे भाई साहब बस दो ही पात्र थे इस नाटक के. शुरू से ही पता नहीं क्यों भाई साहेब हमेशा छोटा भाई बनते थे और मैं बड़ा भाई. एक दिन इसी तरह हमारा खेल चल रहा था. मैं हस्बेमामूल बड़े भाई के रोल में था और भाई साहब छोटे भाई के रोल में. खेलते खेलते वो मुझसे बोले- भाई साहब भूख लगी है.

मैंने झूठमूठ एक डिब्बा खोला और झूठमूठ कुछ निकाला और कहा, लो ये भुजिया खा लो. उन्होंने झूठमूठ के भुजिया खा लिए और बोले- मुझे और चाहिए. मैंने उन्हें समझाकर कहा, ज़्यादा भुजिया खाने से पेट खराब हो जाता है. वो बोले, थोड़े से और देदो भाई साहब. मैंने फिर उन्हें थोड़े से दे दिए. उन्होंने झूठमूठ खा लिए और फिर बोले- ऊं ऊं ऊं थोड़े और दो भाई साहबऊं ऊं ऊं. दे दो ना.

मुझे पता नहीं क्या हुआ. और पता नहीं कैसे. मैंने खींच कर एक थप्पड़ जमा दिया भाई साहब को और बोला- समझ नहीं आता तुम्हें? ज़्यादा भुजिया खाने से पेट खराब हो जाता है? ताड़ से जो थप्पड़ लगा तो वो हक्के बक्के रह गए. उन्हें रोना आ गया और मैं? मैं एकदम से होश में आ गया. मुझे लगा कि मैंने ये क्या कर दिया. तो मुझे भी रोना आ गया. बस हम दोनों एक दूसरे से लिपट कर रोने लगे.

पिताजी ने जब हमारा रोना सुना तो दौड़े आये और पूछने लगे- क्या हुआ, क्यों रो रहे हो? हम चुप, बस एक दूसरे से लिपटे हुए आंसू बहाए चले जा रहे थे. मैं इस घटना को कभी भूल नहीं सका. आज तक नहीं. इस घटना के 34 साल बाद, इसी घटना को आधार बनाकर मैंने एक नाटक लिखा जो आकाशवाणी इलाहाबाद से प्रसारित हुआ. इतेफाक से जब मैंने ये नाटक लिखा, उन दिनों मेरे पिताजी इलाहाबाद आये हुए थे. जब नाटक लिखकर मैंने उन्हें सुनाया. तो कहने लगे- तुम कलाकार लोग पागल होते हो क्या? हां शायद हम कलाकार लोग पागल ही होते हैं तभी तो यात्रा नाटक के दौरान आकाशवाणी कोटा में 15 साल की छोटी सी सरिता जो, तवायफ का ठीक से अर्थ भी नहीं जानती थी, ये रोल करते करते इस तरह रो पड़ती थी कि उसे चुप कराने में हम सबको घंटों लग जाते. चुप कराने वाले भी रोने लगते


'जिस दोस्त को घर नहीं रोका, उस रात डाकुओं ने उसका गला काटा'

53
शेयर्स

पेश है दी लल्लनटॉप की नई सीरीज रेडियो जुबानी की छठी किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.

पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, 5वीं किस्त में आपने छोटे से बच्चे की रेडियो के लिए शुरुआती दीवानगी पढ़ी. अब पढ़िए कि रेडियो और दोस्तों की यादों के बीच जब छोड़ना पड़ा एक शहर.


 

पांचवीं क्लास पास करने के बाद सवाल ये उठा कि किस स्कूल में दाखिला लिया जाए क्योंकि राजकीय प्राथमिक पाठशाला संख्या-1 में छठी कक्षा तो थी नहीं. घर से थोड़ी ही दूर रतन बिहारी जी के पार्क में एक मिडिल स्कूल था, श्री गंगा संस्कृत विद्यालय. पिताजी को लगा मुझे थोड़ी संस्कृत पढ़नी चाहिए और उन्होंने मुझे इस स्कूल में डाल दिया. सारे पुराने साथी छूट गए. पता लगा मेरे खास दोस्तों श्याम सुन्दर, श्याम प्रकाश व्यास और बृजराज सिंह ने सादुल स्कूल में एडमिशन लिया है. मन बहुत दुःखी हुआ. लगा कहीं कुछ खो गया है. बाद की ज़िंदगी में बड़े बड़े झटके खाए तो अपने इस दुःख को याद करके हंसी आती थी मगर उस वक्त यही महसूस हुआ कि नहीं. अपने दोस्तों को छोड़कर जाने के बराबर कोई दुःख हो ही नहीं सकता.

नया स्कूल, नए सहपाठी, नए अध्यापक और नया परिवेश. बहुत रोकते रोकते भी शुरू-शुरू के दिनों में मुझे रोना आ जाता था. तब मुझे संभाला एक लड़के करनी सिंह राठौड़ ने. वो मुझे प्रधानाध्यापक के पास ले गया. मुझे लगा वो मुझे नौ नंबर स्कूल के श्री किशन मास्टर जी की तरह डांटेंगे या हो सकता है एकाध थप्पड़ भी जड़ दें. मैं करणी सिंह से मिन्नतें करने लगा, नहीं, मुझे उनके पास मत ले जाओ, मगर वो नहीं माना और मुझे घसीटकर उनके पास ले गया. मैं सहमा हुआ सा उनके कमरे में पहुंचा. प्रधानाध्यापक जी ने प्यार से मुझे बुलाकर मेरी पीठ पर हाथ रखा तो मैं ज़ोर से फूट पड़ा. उन्होंने पानी मंगवाकर मुझे दिया और बोले, बच्चे क्यों रो रहे हो? क्या तुम्हें किसी ने मारा?

मैंने रोते रोते कहा, नहीं.
तो किसी अध्यापक ने डांटा
मैंने कहा, नहीं
तो फिर क्या हुआ है? क्यों रो रहे हो?

बहुत प्यार से बोल रहे थे वो. क्या जवाब देता मैं? क्या जवाब था मेरे पास? मैंने तब तक किसी अध्यापक को अपने छात्र के साथ इतने प्यार से बोलते हुए नहीं देखा था, इसलिए एक ओर जहां मैं इस नए वातावरण में अपने आपको अकेला पाने की वजह से रो रहा था वहीं प्रधानाध्यापक के इस प्यार भरे व्यवहार ने मेरा रोना और तेज़ कर दिया था. क्योंकि मुझे लगा यही शायद वो दामन है जिसमें मुंह छुपाकर मैं अपने सारे आंसू बहा सकता हूं. अपने मन का पूरा गुबार मैंने उनके दामन को सौंप दिया. मैं थोड़ा प्रकृतिस्थ हुआ. मैंने गौर से उनके चेहरे को देखा. वहां एक अजीब सा वात्सल्य मुझे नज़र आया.

मेरा रोना थम गया था मगर रह रहकर सिसकियां अब भी आ रही थीं. उन्होंने मुझे दुलारते हुए कहा, बच्चे, जब भी तुम्हें कोई दिक्कत हो तुम सीधे मेरे पास चले आया करो. मैंने हां में सर हिलाया और करणी सिंह के साथ आकर क्लास में बैठ गया. अब करणी सिंह से मेरी दोस्ती हो गयी थी और मुझे लगने लगा कि नहीं. मैं इस स्कूल में अकेला नहीं हूं. कम से कम दो लोग हैं जो किसी भी मुसीबत में मेरी सहायता करेंगे. मुझे पता लगा, हमारे प्रिंसिपल का नाम पण्डित गंगाधर शास्त्री है और वो संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान हैं. इस घटना के 33 बरस बाद जब मैं आकाशवाणी, उदयपुर में पोस्टेड था प्रोग्राम क्यूशीट में यही नाम देखकर चौंक पड़ा था. मुझे एक बार को लगा कि नहीं ये पण्डित जी कोई और होंगे क्योंकि!

खैर मैंने पूछा इनकी रिकॉर्डिंग कब है? पता लगा दो दिन बाद. जिस दिन रिकॉर्डिंग थी उस दिन मैं स्टूडियो बिल्डिंग में समय से पहले ही पहुंच गया और पण्डित जी का इन्तजार करने लगा. थोड़ी ही देर में पण्डित जी ने मेन् गेट में प्रवेश किया और मैं चकित रह गया, उनकी शक्ल-सूरत, चाल-ढाल किसी में कोई फर्क नहीं आया था. मैं आगे बढ़ा और उनके चरणों में झुक गया. उन्होंने मेरे चेहरे की तरफ देखा, आशीर्वाद दिया मगर न पहचान पाने का भाव उनके चेहरे पर साफ़ पढ़ा जा सकता था, जो स्वाभाविक भी था.

कहां एक छठी-सातवीं का छात्र और कहां 42 बरस की अधेड़ावस्था की ओर तेज़ी से बढ़ता इंसान. मैंने उनकी उलझन को दूर किया. उन्हें अपना नाम और स्कूल का नाम बताया तो उन्हें भी सब कुछ याद आ गया. वैसे तो हर अध्यापक अपने जीवनकाल में हज़ारों छात्रों को पढ़ाता है और उसके लिए किसी भी छात्र को याद रखना आसान नहीं होता मगर ये मेरा सौभाग्य ही मानता हूं कि पढ़ाई में बहुत असाधारण न होते हुए भी मेरे अध्यापकों ने अक्सर मुझे याद रखा है.

मुझे एक बार फिर से याद आ गए छठी और सातवीं क्लास के वो दिन जब मैंने आधा छठी का और आधा सातवीं का साल पण्डित जी के सान्निध्य में गुज़ारा था और उसी दौरान उनकी प्रेरणा से संस्कृत भारती संस्कृत प्रबोध और संस्कृत विनोद एक के बाद एक तीन परीक्षाएं पास कर ली थीं. यानि सातवीं कक्षा में मैंने संस्कृत में ग्रेजुएशन स्तर प्राप्त कर लिया था और ये सब पण्डित गंगाधर शास्त्री जी के प्रोत्साहन से ही हो पाया था. जानते हैं अभी अभी मेरे उदयपुर के एक साथी दीपक मेहता ने मुझे बताया कि मेरे वो गुरु ईश्वर की कृपा से आज भी ज़िंदा हैं और नाथद्वारा के दिलीप शर्मा ने बताया है कि हालांकि वो आजकल अस्वस्थ हैं मगर जब दिलीप ने उन्हें मेरे बारे में बताया तो वो बहुत खुश हुए और मेरे लिए ढेरों आशीर्वाद भिजवाए हैं.

पंडित जी के प्रोत्साहन से जहां मैंने ये परीक्षाएं पास कीं, वहीं अब मैं स्टेज पर खुलकर बैंजो के प्रोग्राम देने लगा था और अपने स्कूल के लिए कई प्रतियोगिताओं में इनाम जीतकर लाने लगा था. छठी और सातवीं के इन दो सालों की ये उपलब्धियां निश्चित ही मेरे लिए अभूतपूर्व थी मगर इस बीच जो कुछ मैंने खोया उसे भी मैं जीवन भर नहीं भूल पाऊंगा. वो रात वो डरावनी रात आज भी मेरी आंखों में, मेरे जेहन में ज्यों की त्यों ज़िंदा है जिसकी वजह से आज ये एपिसोड में लिख रहा हूं और जो मेरे एक नाटक लम्हों ने खता की थी की विषयवस्तु बनी.

छठी कक्षा का आधा साल गुजरा था. तब तक करणी सिंह के अलावा आशुतोष कुठारी और जगमोहन् व्यास जैसे कुछ और दोस्त भी बन गए थे और दो महीनों की तैयारी में संस्कृत भारती परीक्षा पास कर लेने की वजह से टीचर्स भी मुझसे ठीक से पेश आने लगे थे कि एक दिन स्कूल से घर लौट कर आया तो पता चला, पिताजी का तबादला सरदारशहर हो गया है और हमें एक हफ्ते में अपना बोरिया बिस्तर बांधकर बीकानेर से रवाना होना है.

दिल धक् से रह गया. इतनी मुश्किल से नए स्कूल के वातावरण में ढाला था मैंने अपने आपको. अब फिर सब कुछ शून्य से शुरू करना पड़ेगा? मैं नहीं जानता था कि नियति अपने गर्भ में मेरे लिए कितना ज़बरदस्त अभिशाप लिए बैठी है, वरना मैं कुछ भी करता सरदार शहर नहीं जाता. मेरी बाई (दीदी) बीकानेर में रहती थीं. उनके पास रहकर ही वक्त गुज़ार लेता. मगर नहीं नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था और मैं उसी के इशारों पर चलते हुए पिताजी, मां और भाई साहब के साथ एक सुबह सरदारशहर आ गया, अपने दोस्तों के पीछे छूट जाने का अफ़सोस दिल में छुपाये हुए.

दूर रिश्ते की मेरी एक नानी कसाइयों के मोहल्ले में रहती थीं, उनका ऊपर का हिस्सा हमने किराए पर ले लिया. दिन किसी तरह गुज़रा. शाम गहराने लगी तो मैं बिजली का स्विच ढूंढने लगा. वहां न तो कोई स्विच था और न ही कोई बल्ब. पता चला सरदारशहर के ज़्यादातर इलाकों में बिजली नहीं थी और ये मोहल्ला उन्हीं इलाकों में से एक में था. चौराहे पर नज़र दौड़ाई तो देखा, एक आदमी सीढ़ी कंधे पर रखकर आया और वहां लगे हुए लैम्प पोस्ट पर चढ़कर उसने उसमें मिट्टी का तेल डाला और उसे जला दिया. मिट्टी के तेल का वो नन्हा सा दिया घनघोर अंधेरे से लड़ने की जी तोड़ कोशिश करने लगा. मगर क्या औकात थी उस छोटे से दिये की. उस घुप्प अंधेरे के सामने?

अन्धेरा उस दिये की हिमाक़त को देखकर अट्टहास कर उठा. मेरा मन घबरा गया. नहीं, नहीं दरअसल ये कोई अट्टहास नहीं था. कसाइयों का मोहल्ला था. किसी घर में बंधे बकरे को शायद अगली सुबह आने वाली अपनी मौत की आहट सुनाई दे गई थी और वो ज़ोर से चीख पड़ा था. बड़ी ही दर्दनाक थी वो चीख. आज भी उस चीख को याद कर मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

वो अंधेरी रात किसी तरह गुज़री. दूसरे रोज़ सुबह हुई फिर एक चीख से. खिड़की में जाकर खड़ा हुआ, तो देखा, एक बकरे का गला रेता जा रहा था और वो चिल्लाये जा रहा था. मैंने सोचा, अभी इसका गला पूरा काट दिया जाएगा और ये शांत हो जाएगा, मगर ये क्या? उसका आधा गला काटकर छोड़ दिया गया था तड़पने और चिल्लाने के लिए. मैं एकदम सन्न. मैंने पिताजी से पूछा कि इस बकरे का गला आधा काटकर क्यों छोड़ दिया उस आदमी ने? तो उन्होंने बताया कि इसे हलाल करना कहते हैं. पूरे दिन उस बकरे का आधा कटा हुआ वो गला, उसकी वो तड़पती देह और दिल को दहलाने वाली चीखें मेरे ज़ह्नोदिल पर छाई रहीं.

उसी दिन पिताजी मुझे दाखिला करवाने के लिए हनुमान संस्कृत विद्यालय लेकर गए. प्रिंसिपल के कमरे में हम लोग पहुंचे तो मेरा दिल प्रार्थना कर रहा था भगवान करे प्रिंसिपल कह दें कि हमारे यहां जगह नहीं है, हम इसे एडमिशन नहीं दे सकते. और फिर तो पिताजी को मुझे बीकानेर वापस भेजना ही पड़ेगा. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ, प्रिंसिपल ने मेरा और मेरे पिताजी का स्वागत किया और मेरा एडमिशन हो गया. पिताजी मुझे प्रिंसिपल के कमरे में छोड़कर घर लौट गए और मैं एक बार फिर अजनबियों के बीच में खडा था. मुझे रोना आने लगा जिसे बड़ी मुश्किल से मैंने रोका.

मुझे प्रिंसिपल सर का चपरासी क्लास में लाकर छोड़ गया था. उस समय क्लास में कोई टीचर नहीं था. मैं रुआंसा सा कमरे के एक कोने में जाकर खड़ा हो गया, तभी क्लास का मॉनीटर मेरे पास आया और बोला, नया आया है? मैंने हां में गर्दन हिला दी. वो फिर बोला, मेरा नाम तेजकरण छाजेड़ है. मैं क्लास का मॉनीटर हूं, आ तेरे बैठने की व्यवस्था करता हूं. मैं क्या करता? उसके पीछे पीछे चल पड़ा. मेरे कानों में रह रहकर पिछली रात सुनी बकरे की चीख गूंज रही थी. मुझे लग रहा था, अभी मेरे गले से भी वैसी ही चीख निकल पड़ेगी और कुछ लोग मुझे दबोच लेंगे जैसे कि मैं अपनी कल्पना में उस बकरे को दबोचे जाते हुए देख रहा था. मुझे लग रहा था, अब तक उस बकरे को दबोच कर काट डाला गया होगा और शायद उसकी खाल उतारी जा रही होगी.

अभी मेरी भी खाल उसी तरह से उधेड़ी जाएगी . मेरा मन कर रहा था इस डरावने माहौल से बस किसी तरह भागकर बीकानेर पहुंच जाऊं. नहीं पढ़ना है मुझे. तेजकरण ने कुछ बच्चों को इधर उधर किया और एक लड़के के पास मेरी बैठने की व्यवस्था कर दी. वो बोला, देख ये कल्याण सिंह है. बहुत अच्छा लड़का है, इसलिए तेरी व्यवस्था इसके साथ की है मैंने. आज सोचता हूं, नियति ने क्यों मेरे साथ ये खेल खेला? बीकानेर में ही पढ़ता रहता तो उस भगवान का क्या बिगड़ जाता? क्यों मुझे बीकानेर से लाकर इस लड़के कल्याण सिंह की बगल में लाकर बिठा दिया था? मैं नज़रें नीची किये चुपचाप बैंच पर कल्याण सिंह के साथ बैठ गया तो कल्याण सिंह बोला क्या बात है भायला (दोस्त), बहुत उदास है?

जवाब में मेरी आंखों से टप-टप दो आंसू टपक गए. कल्याण सिंह बोला, अरे रोने क्यों लगा? तू चिंता मतकर यहां सारे टीचर्स बहुत अच्छे हैं, कभी नहीं मारते और अब तो हम लोग भायले बन गए हैं. अरे तेज करण देख तो इस छोरे को रोने लगा है ये. तेज करण भी वहां आ गया और मुझे दिलासा देने लगा. रोते रोते आखिर आंसू भी तो साथ छोड़ देते हैं न? खैर चार छह दिन में मेरा मन लगने लगा था. तेजकरण और कल्याण सिंह दोनों ही मेरा बहुत ख़याल रखते थे. कल्याण सिंह का गांव सरदारशहर से 60-70 किलोमीटर दूर था और उसके पिताजी बैंक में चौकीदार थे. हर शनिवार को शाम को कल्याण सिंह के पिताजी उसे गांव जाने वाली बस में बिठा देते थे और सोमवार को वो वापस सरदारशहर आ जाया करता था.

बाकी दिन वो बैंक में अपने पिताजी के साथ ही रहता था. कभी कभी मैं, कल्याण सिंह और तेजकरण साथ बैठ कर पढ़ा करते थे. कल्याण सिंह का तो घर वहां था नहीं, इसलिए कभी हम तीनों मेरे घर रह जाते और कभी तेज करण के घर. दिन इसी तरह गुज़र रहे थे. हम तीनों ही क्लास में पढ़ने में सबसे आगे थे. हम तीनों अच्छे अंक लाने की कोशिश तो करते थे मगर हमारी दोस्ती पर उसका कोई असर नहीं पड़ता था. कल्याण सिंह और तेजकरण मेरे पक्के दोस्त बन गए थे और मेरी हर समस्या का समाधान भी. मैं अब थोड़ा नॉर्मल हो गया था. इसी बीच छठी कक्षा के इम्तिहान आ गए. रिज़ल्ट आया तो कल्याण सिंह क्लास में पहले नंबर पर आया, मैं दूसरे नंबर पर और तेजकरण तीसरे नंबर पर. हम तीनों बहुत खुश थे. लग रहा था हम तीनों ही क्लास में अव्वल आये हैं.

इम्तिहान के बाद छुट्टियां हो गईं. अब मुझे बीकानेर जाने से रोकने वाला कोई नहीं था क्योंकि पिताजी ने वादा किया था कि छुट्टियों में वो मुझे बीकानेर भेज देंगे. रतन, निर्मला और मग्घा भी तो आनेवाले थे बीकानेर. मेरा मन एक ओर उनसे मिलने को बेताब था वहीं कल्याण सिंह और तेजकरण को छोड़ने का बहुत अफ़सोस भी हो रहा था मगर कल्याण का घर तो वहां था नहीं. उसे तो हर हाल में अपने गांव जाना ही था, इसलिए बड़ी अजीब सी दुविधाओं में घिरा मैं छुट्टियों में बीकानेर आ गया. अगर मुझे पता होता कि मेरे वापस आते ही कल्याण के साथ ये सब कुछ होने वाला है तो मैं किसी भी हालत में न उसे गाँव जाने देता और न ही खुद बीकानेर आता.

छुट्टियां खत्म हुई और 21 जून को मैं वापस सरदारशहर आ गया क्योंकि एक जुलाई से स्कूल खुलने वाले थे. एक जुलाई को बहुत खुश खुश स्कूल गया और कल्याण और तेजकरण को देख कर फिर मेरा मन भर आया. हम तीनों दोस्त गले लगकर मिले और पहली बार मैंने देखा कि मेरी आंखों में आये आंसुओं ने कल्याण की आंखें भी भर दीं.

हमने एक दूसरे से वादा किया, चाहे कुछ भी हो जाए. हम पूरे जीवन एक दूसरे से अलग नहीं होंगे. हा हा हा.!

हम जीवन की बात कर रहे थे मगर हम जानते कहां थे कि जीवन क्या होता है? कल्याण की बात तो खैर छोड़िए मगर कहां है वो हमेशा कत्था अपने मुंह में डाले रहने वाला तेजकरण? हां, तेजकरण के पिताजी का असम में कत्थे का व्यापार था और उसकी आदत पड़ गई थी अपने घर में मौजूद रहने वाले कत्थे में से एक टुकड़ा अपने मुंह में डाल लेने की और उसे चूसते रहने की. अगर आज कहीं देश के किसी कोने में बैठा तेजकरण मेरी इस बात को पढ़ रहा हो तो मैं उससे आग्रह करूंगा, दोस्त मैं आज भी तुम्हें बहुत याद करता हूँ, तुम जहां कहीं भी हो, मुझसे संपर्क करो, मुझे, यकीन जानो, दूसरा जीवन मिल जाएगा.

जुलाई का महीना था, बादल घिरने लगे थे. जैसा कि मैंने बताया घर में बिजली का कनेक्शन नहीं था, रात में आसमान में छाये काले काले बादलों के बीच चमकती बिजली बहुत डरावनी लगती थी. पता नहीं क्यों ऐसे डरावने मौसम में मेरे मोहल्ले के घरों में बंधे हुए बकरे कुछ ज़्यादा ही डर जाते थे और कुछ इस तरह चीखने लग जाते थे कि मेरा दिल रह रहकर धक् धक् कर उठता था. इसी बीच वो शनिवार आगया. हर शनिवार कल्याण सिंह अपने गांव जाता था मगर उस दिन सुबह से ही रह रहकर बारिश हो रही थी और कल्याण सिंह के पिताजी को उस दिन अपने मैनेजर साहब के साथ बीकानेर जाना था, इसलिए उन्होंने कल्याण सिंह को कहा कि वो ऐसे खराब मौसम में गांव न जाए क्योंकि गाँव दूर था और उस ज़माने में न तो बसें आज जितनी अच्छी हुआ करती थीं और न ही सड़कें.

उन्होंने कल्याण सिंह को कहा कि वो आज गांव न जाकर बैंक में ही चपरासी आसू राम के पास सो जाए. स्कूल में उसने मुझे ये बताया कि वो गांव नहीं जा रहा है, बैंक में ही रहेगा. स्कूल खत्म होने तक मौसम और भी खराब हो गया था. 5 बजे ही इतना अन्धेरा हो गया था मानो रात हो गयी हो. बादल इस तरह गरज रहे थे मानो अभी पूरी धरती को निगल जायेंगे. मेरा घर स्कूल से बैंक जाते हुए रास्ते में पड़ता था. स्कूल से निकल कर मैं और कल्याण मेरे घर तक पहुंचे तब तक वो भयंकर गरजते हुए बादल बरसने लगे थे. मैंने कल्याण को ज़बरदस्ती अपने घर में खींच लिया. हम लोग भीग चुके थे. मैंने उसे तौलिया दिया और कहा कल्याण, यार बहुत तेज़ बारिश होने लगी है, बादल गरज रहे हैं, कल छुट्टी है, तेरे पिताजी भी यहां नहीं हैं, तू बैंक जाकर क्या करेगा?तू मेरे यहां क्यों नहीं रुक जाता ?

वो बोला, नहीं यार पिताजी कहकर गए हैं कि मैं बैंक में आसू चाचाजी के पास ही रहूं. अब अगर मैं उनकी बात नहीं मानूंगा तो वो नाराज़ हो जायेंगे. इससे अच्छा तो ये है कि तू अपने पिताजी से पूछ ले, हम दोनों बैंक चलते हैं और तू वहाँ मेरे साथ ही रह जाना.

मैं जिद करने लगा कि वो मेरे घर रह जाए मगर वो बोला देख यार मेरे पिताजी तो बीकानेर जा चुके हैं और मुझे कहकर गए हैं कि मैं बैंक में रहूं. अब अगर मैं यहां रहूंगा तो उनकी आज्ञा के बिना रहना पड़ेगा, लेकिन तेरे तो पिताजी यहीं हैं, तू उनकी इजाज़त ले सकता है, चल न, पिताजी से पूछ ले और मेरे साथ बैंक चल, हम खूब बातें करेंगे प्लीज़हम दोनों अपनी अपनी जिद पर अड़े रहे. वो कहता रहा, बैंक चल हम दोनों वहां रहेंगे और मैं कहता रहा, तू मेरे घर ही रह जा. बारिश कम हो गयी थी मगर हमारे बीच कोई सझौता नहीं हो पा रहा था.

जब कोई समझौता नहीं हुआ तो यही तय हुआ कि वो बैंक जाकर अपने आसू चाचा जी के पास सोयेगा और मैं अपने घर. वो निकल पड़ा. मैं पता नहीं क्यों बेचैन होकर तब भी उसकी मिन्नतें कर रहा था, यहीं रह जा न यार. मगर वो नहीं माना. आगे बढ़ता गया. बढ़ता गया.. अब भी अक्सर बारिश के मौसम में जब काले काले बादल गरजते हैं तो लगता है, मैं वहीं सरदारशहर के कसाइयों के मोहल्ले के उस घर के बाहर खड़ा कल्याण सिंह की मिन्नतें कर रहा हूँ. यहीं रुक जा न यार.? मत जा ना कल्याण..कहना मान ले न मेरा मगर होनी उसे बहुत शिद्दत से बुला रही थी. वो नहीं रुका. वो कल्याण सिंह वो मेरा सबसे गहरा दोस्त मेरी मिन्नतों को ठुकराकर इस बात पर नाराज़ होकर चला गया कि मैंने उसकी बात नहीं मानी मैं उसके साथ नहीं गया.

मैं निराश होकर घर के अंदर लौट आया. बादल अब भी कहानियों के राक्षसों की तरह गरज रहे थे. आखिरकार मैं कल्याण सिंह के बारे में सोचते सोचते सो गया. अगले दिन का सूरज मेरे लिए मेरी ज़िंदगी की सबसे भयंकर सुबह लेकर आया. आधी नींद में था कि पिताजी को माँ से फुसफुसाकर कहते सुना महेन्द्र को मत बताना, घबरा जाएगा मैं चौंककर उठा. मैंने पूछा क्या हुआ? पिताजी चुप. मुझे लगा, ज़रूर कुछ अनहोनी हुई है. मैं चिल्लाया बताइये न कि क्या हुआ?

उसके बाद उन्होंने जो कुछ बताया और जो तस्वीरें मैंने अगले दिन अखबारों में देखीं, उसने मुझे एक बार को पूरी तरह खत्म कर दिया. उस रात कल्याण सिंह बैंक जाकर चपरासी आसू राम के पास सो गया था और खराब मौसम का फायदा उठाकर कुछ डाकू बैंक में घुस गए थे. आसूराम बेचारा चपरासी था, कोई हथियार भी नहीं था उसके पास. डाकू अपना काम आसानी से कर सकें इस लिए उन्होंने आसूराम को तलवार से काट डाला, तभी कल्याण सिंह की आंख खुल गयी, वो रोने लगा तो उन बेरहम डाकुओं ने उसका भी गला तलवार से रेत डाला. दूसरे दिन अखबार में जो फोटो छापा था, उसे मैं अंतिम सांस तक नहीं भूल सकता. एक खाट पर आसूराम का शव पड़ा था और उसके ऊपर कल्याण सिंह का शव था जिसका गला आधा रेता हुआ था.

ठीक उसी तरह जैसे मेरे मोहल्ले के कसाई बकरे का आधा गला रेत कर उसे चिल्लाने और मरने के लिए छोड़ दिया करते थे, हलाल के नाम पर मेरे कानों में कल्याण सिंह की वो चीखें गूंज रही थीं. और मेरी आंखों के आगे उसका वो आधा कटा हुआ गला स्थायी रूप से अंकित हो गया. मुझे लगा, उसका खून डाकुओं ने नहीं, मैंने किया है.

अगर मैं उसे ज़बरदस्ती रोक लेता. तो आज वो भी इस दुनिया में होता. क्या बिगड़ जाता अगर मैं उसके पैर पकड़ लेता. या दो थप्पड़ मार कर ही रोक लेता. कम से कम उसकी जान तो नहीं जाती. आज भी जब कभी काले काले बादल आसमान में घुमड़ते हैं, बिजली कड़कड़ाती है, लोग मौसम अच्छा हो गया कहकर पिकनिक पर निकल पड़ते हैं, तो उसका वो मुस्कुराता चेहरा, उसके घुंघराले बाल, उसका गोरा चेहरा मेरी आंखों के सामने रह रहकर आ जाता है लेकिन तुरंत ही उसका वो आधा कटा हुआ गला. उससे उबलकर फैला हुआ खून इन सबको धुंधला कर देता है और मेरे कानों में उसकी चीखें गूंजने लगती हैं और मैं फिर पछतावे से भर उठता हूं, ..काश मैं उस रात उसे अपने घर रोक लेता.


'मिस्टर मोदी, ये इंजीनियरिंग है, अपनी टांग मत अड़ाइए'

46
शेयर्स

पेश है दी लल्लनटॉप की नई सीरीज रेडियो जुबानी की 7वीं किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.

पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, 5वीं और छठी किस्त में आपने छोटे से बच्चे की रेडियो के लिए शुरुआती दीवानगी पढ़ी. अब पढ़िए कि जब रेडियो स्टेशन की लाइन में होने लगी गड़बड़ी.


 

जिस उम्र में स्कूल में पेन-पेन्सिल खो जाना या होम वर्क न कर पाने पर टीचर की डांट पड़ जाना या फिर किसी खिलौने का टूट जाना बहुत बड़ी दुर्घटना लगती है, उस उम्र में मैंने अपने प्यारे दोस्त कल्याण सिंह को इस तरह खो दिया था. मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये आखिर हुआ क्या है? मौत से ये मेरा पहला आमना-सामना था. नहीं नहीं शायद ये कहना ठीक नहीं होगा कि मौत से ये मेरा पहला साबका था क्योंकि सरदार-शहर के कसाइयों के उस मोहल्ले में. कोठरी में बंद झुण्ड में से छांट कर लाने से लेकर ज़िबह किए जाने और जान निकलने तक लम्हा लम्हा मरते हुए उन बेजुबान जानवरों को अपनी खिड़की से न चाहते हुए भी मैं रोज देखा करता था.

वो छटपटाते थे मौत के पंजों से बचने के लिए मगरमौत अट्टहास कर उठती थी और वो तब तक चीखते रहते थे जब तक कि आधी कटी गर्दन से उबलता हुआ खून धरती को पूरी तरह भिगो नहीं देता था.

कुछ ही देर में उनकी आंखें पथरा जाती थीं और कुछ हाथ तैयार हो जाते थे गर्दन को धड़ से अलग कर खाल उतारने के लिए. पास की कोठरी में बंद बाकी बकरे जो इतनी देर तक सांस रोके उस कट रहे बकरे की चीखें सुन रहे होते. अब मिमियाने लगते थे. इसी उम्मीद में कि शायद आज उनकी जान बच गई. न जाने क्या हो गया था मुझे, जब भी किसी कसाई के घर में कोई बकरा कटता, उसकी हर चीख के साथ मेरी आंखों के सामने कल्याण सिंह का चेहरा उभर आता और मुझे लगता कुछ हाथ उसे कसकर पकड़े हुए हैं और दो हाथ धीरे धीरे उसका गला रेत रहे हैं और. और.. उन कई जोड़ा हाथों में से एक जोड़ा हाथ मेरे भी हैं.

मैंने ही थाम रखा है उसके जिस्म को और कोई रेत रहा है उसका वो मासूम गला जिसने अपने जीवन के 12 सावन भी नहीं देखे थे. और मैं चौंक कर जाग जाता था. देखता मैं छत कि मुंडेर पर खड़ा हूं और मुझे मां और पिताजी ने दोनों तरफ से थाम रखा है. मैं पूछता, ..क्या हुआ? पिताजी कहते, कुछ नहीं, तुम सो जाओ. और मैं अपने बिस्तर पर आकर सो जाता. हर रोज यही सिलसिला.

मैं आधी रात को उठकर चल पड़ता था उस ओर जिधर से कल्याण सिंह की चीखें मुझे बुलाती थीं. मां और पिताजी परेशान हो गए थे क्योंकि जिस छतपर हमलोग सोते थे उसकी दीवारें बहुत छोटी थीं. पूरी रात वो दोनों जागते रहते थे क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं ऐसा न हो, उनकी आंख लग जाए और नींद में चलते हुए मैं उस छोटी सी दीवार से नीचे गिर जाऊं.

पिताजी मुझे लेकर स्कूल गए. स्कूल के प्रिसिंपल ने बहुत स्नेह से मेरी पीठ पर हाथ रखा और कहा, बेटा तुम तो बहुत बहादुर बच्चे हो, जाओ, अपनी क्लास में जाओ. मैं अपनी क्लास में पहुंचा, देखा सबसे आगे की लाइन में दूसरी डेस्क पर बैठा हुआ कल्याण सिंह मुस्कुराते हुए मुझे बुला रहा है. मुझे लगा, मैं यूं ही डर रहा था. कल्याण सिंह तो वहीं बैठा है. अपनी पुरानी जगह पर. मैं डेस्क पर पहुंचा तो अचानक कल्याण सिंह चीख पड़ा. ये चीख बिल्कुल वैसी ही थी जैसी मैं हर रोज अपने घर की खिड़की में खड़े होकर अपने आस पास के घरों में से आते हुए सुनता था. मुझे लगा कोई कल्याण सिंह के गले पर छुरी फेर कर उसे रेत रहा है और कल्याण सिंह के गले से एक दबी हुई चीख निकल रही है.. मुझे चक्कर सा आया और मैं बेहोश होकर गिर पड़ा.

मुझे होश आया तो मैं घर पर था. पिताजी मां से कह रहे थे, तुम लोग बीकानेर चले जाओ, मुझे नहीं लगता कि महेन्द्र को इन हालात में यहां रहना चाहिए. मैं आंखें बंद किये हुए ये सब सुन रहा था. पता नहीं कब फिर मेरी आंख लग गयी. जब आंख खुली तो देखा सुबह का समय था वो. मैं शायद पूरी रात सोता रहा था मगर आज भी याद है मुझे. मैं उस पूरी रात कल्याण सिंह के साथ था, कभी स्कूल के प्ले ग्राउंड में, कभी प्रार्थना स्थल पर और कभी क्लास में उस छोटे से डेस्क पर उस से बिल्कुल सटकर बैठे हुए. मुझे बाद में पिताजी ने एक बार बताया कि दरअसल उस पूरी रात में बिस्तर पर नहीं सोया था, इधर से उधर टहलता रहा था.

आखिरकार मुझे लेकर मेरी मां बीकानेर लौट आईं. भाई साहब पहले से ही यहां ताऊ यानि बा के घर राम भाई साहब और गायत्री भौजाई के पास रह रहे थे. मेरा दाखिला फिर से गंगा संस्कृत स्कूल में करवा दिया गया. करनी सिंह, आशुतोष कुठारी झंवर लाल व्यास और दूसरे दोस्तों ने देखा कि मैं बदल गया हूं. बिल्कुल बदल गया हूं. इस दुर्घटना ने एक ही झटके में, बड़ी बेरहमी से जैसे मुझसे मेरा बचपन छीन लिया था. ऐसे में मुझे बहुत बड़ा मानसिक सहारा दिया, मेरे प्रिंसिपल पंडित गंगाधर शास्त्री जी ने. उन्होंने देखा कि खेलकूद में मेरी रुचि बिल्कुल खत्म हो गयी थी और मैं बहुत गंभीर रहने लगा था. उन्होंने मेरे बदले हुए स्वभाव को समझते हुए, मुझे कुछ बहुत अच्छी अच्छी पुस्तकें दीं और कहा देखो बेटा, जब मन बहुत अशांत हो तो ये किताबें पढ़ा करो. मन को बहुत शान्ति मिलेगी. और सचमुच उन किताबों ने मुझे बहुत संभाला. किताबें मेरी सबसे अच्छी दोस्त बन गईं.

किताबें पढ़ने की ऐसी आदत लग गई कि अपने 35 बरस के कार्यकाल में जिस जिस केन्द्र पर मेरी पोस्टिंग रही. मैंने वहां की लायब्रेरी को पूरी तरह से पढ़कर ही छोड़ा. इसी बीच पंडित जी ने मुझे तैयारी करवा कर संस्कृत की दो परीक्षाएं और पास करवा दीं, संस्कृत प्रबोध और संस्कृत विनोद. इस तरह सातवीं क्लास में मैंने संस्कृत में स्नातक स्तर की परीक्षा पास कर ली थी. यहीं से भाषाओं के प्रति मेरे मन में रुचि जागनी शुरू हो गई. आगे जाकर मैंने बाक़ायदा उर्दू और पंजाबी सीखी, टूटी फूटी रूसी अपने बा की मदद से और जर्मन अपने इलाहाबाद प्रवास के दौरान विभास चंद्र की सहायता से सीखी.

सातवीं क्लास पास करने के बाद मैंने एक बार फिर स्कूल बदला. घर में सबकी राय थी कि चूंकि नौवीं क्लास में मुझे साइंस लेनी है, बेहतर ये होगा कि मैं आठवीं में ही सादुल स्कूल ज्वाइन कर लूं ताकि एक साल में मैं अपने आपको नए स्कूल के माहौल में ढाल सकूं. स्कूल बदलना मुझे हमेशा तकलीफ देता था, इस बार भी मैं थोड़ा परेशान हुआ, मगर इत्तेफाक से श्याम सुन्दर मोदी, श्याम प्रकाश व्यास, ब्रजराज सिंह जैसे कुछ पुराने दोस्त जो मेरे साथ राजकीय प्राथमिक पाठशाला संख्या-1 में थे. यहां मुझे मिल गए थे. इनके साथ साथ शशि कान्त पांडे और हरि प्रसाद मोहता जैसे कुछ नए दोस्त भी बन गए.

आगे जाकर यही शशि आकाशवाणी में भी न केवल मेरा सहकर्मी बना बल्कि, न जाने किस किस तरह की कितनी मुसीबतों में उसने रेडियो के लोगों के मिज़ाज के बिल्कुल खिलाफ एक सच्चे दोस्त की तरह मेरा साथ दिया. मैं जब आकाशवाणी, बीकानेर में था तो क़मर भाई ने एक बार कहा था, रेडियो में सहकर्मी तो खूब मिलेंगे तुम्हें, मगर रेडियो में दोस्त ढूंढने की कोशिश कभी मत करना. जब भी ऐसा करोगे, याद रखना एक गहरी चोट खाओगे. क़मर भाई के बारे में विस्तार से आगे चलकर लिखूंगा, जब आकाशवाणी बीकानेर की बात चलेगी, अभी तो यही कहूंगा कि उन्होंने बिल्कुल सही सीख दी थी मुझे. 36 साल की नौकरी में, कई बार क़मर भाई की सीख को भुलाकर भी मैं अपने रेडियो के सहकर्मियों में से कुल 20दोस्त भी नहीं जुटा सका.

इसी बीच एक और तब्दीली आई मेरी ज़िंदगी में. मेरे छोटे मामाजी जो पहले जयपुर में रहते थे, अब बीकानेर आ गए थे. उनका दिमाग तकनीकी कामों में बहुत चलता था. उन्होंने बीकानेर आकर एक स्टील फ़र्नीचर का कारखाना लगाया, आर सी ए इंडस्ट्रीज़. ये कारखाना मेरे स्कूल और घर के बीच में पड़ता था. मामाजी के कारखाने में अच्छा खासा स्टाफ था मगर मामाजी खुद भी हमेशा मशीनों से जूझते रहते थे. स्कूल से लौटते हुए मैं अक्सर उनके कारखाने में रुक जाया करता था और वो जो भी काम कर रहे होते थे, मैं उस काम में उनका हाथ बंटाने लगता.

मुझे बड़ा अच्छा लगता था मशीनों को खोलना, उन्हें ठीक करना और फिर वापस वैसे का वैसा जोड़ देना. उन दिनों घर में अक्सर ये चर्चा चलती थी कि नौवीं कक्षा में मुझे क्या विषय लेने हैं. मामाजी ने सलाह दी कि मुझे गणित विषय लेकर इंजीनियरिंग में जाना चाहिए क्योंकि मेरा दिमाग इस तरह के कामों में अच्छा चलता था. इस तरह मामाजी के उस कारखाने में कभी कभार उन मशीनों से जूझते हुए मेरे जीवन की दिशा तय होने लगी. मैंने नौवीं में मैथ्स ली भी और इंजीनियरिंग में दाखिला भी लगभग ले ही लिया था मगर होनी को तो मुझे माइक्रोफोन के सामने लाकर खड़ा करना था जहां मुझे अपने अनगिनत श्रोताओं से जुड़ना था. मगर मशीनों में इस रुचि ने मुझे रेडियो के मेरे पूरे जीवन में बहुत से नए नए अनुभव भी दिए, कई बार लताड़ भी पड़वाई और कई अवसरों पर शाबाशी भी दिलवाई.

हालांकि जीवन भर अपने अधिकांश इंजीनियर साथियों से मेरे अच्छे सम्बन्ध रहे मगर मशीनों से जूझ जाने की इसी आदत की बदौलत मुझसे पंगा लेने वाले कुछ इंजीनियरों को कई बार मैंने मज़ा भी चखाया. यहां एक मज़ेदार किस्सा याद आ रहा है जो हालाँकि मुझे कुछ आगे जाकर लिखना चाहिए था, जबकि मैं आकाशवाणी बीकानेर के अपने कार्यकाल की बात करता मगर कहीं ऐसा न हो कि एक बार रेडियो ज्वाइन करने तक पहुँच कर कैक्टस के कांटों में इतना उलझ जाऊं कि ऐसी हल्की फुल्की बातें ज़ेह्न से ही उतर जाएं.

ये बात है साल 1977-78 की. मैं आकाशवाणी, बीकानेर में ट्रांसमिशन एक्जेक्यूटिव था. हमारे स्टेशन इंजीनियर थे घनश्याम वर्मा. पूरे सफ़ेद बाल, गोरे चिट्टे, कड़क आवाज़. कुल मिलाकर प्रभावशाली व्यक्तित्व. आकाशवाणी में जहां प्रोग्राम स्टाफ और इंजीनियरिंग स्टाफ कंधे से कंधा मिलाकर काम करता आया है वहीं कभी कभी कुछ ऐसे अफसर आ जाते हैं जो इंजीनियरिंग और प्रोग्राम स्टाफ के बीच खाई पैदाकर अपने आपको महान साबित करने की कोशिश करते हैं. इत्तेफाक से वर्मा साहब उसी तरह की ज़ेहनियत के इंसान थे. मशीनों के मामले में वो आकाशवाणी का सबसे बुरा समय था. जापान के निप्पन रिकॉर्डर जा रहे थे और थोक के भाव न जाने किस किस स्तर पर रिश्वत खा खिलाकर उसके बलबूते पर एकदम कचरे से भी गए गुज़रे बैल के रिकॉर्डर और डैक आकाशवाणी में भर दिए गए थे.

बेचारे इंजीनियरिंग एसिस्टेंट और टेक्नीशियन रात और दिन उन्हें ठीक करने में ही जुटे रहते थे. हम प्रोग्राम के लोग इन मशीनों पर काम करते करते इनकी बहुत सी कमजोरियों को जान गए थे. एक दिन एक मशीन कुछ गड़बड़ कर रही थी. बहुत माथापच्ची चल रही थी. वर्मा साहब भी वहीं मौजूद थे कि न चाहते हुए भी मेरे मुंह से एक जायज़ सी राय निकल गयी. बस मेरा बोलना था और वो चिल्ला पड़े, आप चुप रहिये मिस्टर मोदी, ये इंजीनियरिंग का मामला है, इसमें अपनी टांग मत अड़ाइये.

मेरा चेहरा उतर गया. पन्द्रह बीस लोगों के बीच उन्होंने मेरा पानी उतार दिया था. मैंने धड़ाम से स्टूडियो का दरवाज़ा बंद किया और बाहर आ गया. शुरू से मिज़ाज थोड़ा गर्म ही रहा. इस तरह बेइज्ज़त होना बहुत खल गया और मैं वर्मा साहब को झटका देने का रास्ता तलाशने लगा.
हम लोगों को रोज शाम को 5.55 बजे पर दिल्ली से और 6 बजे जयपुर से आनेवाला कार्यक्रम विवरण रिकॉर्ड करना होता था ताकि अगर कोई महत्त्वपूर्ण दिल्ली या जयपुर से आनेवाला है तो हम अपने कार्यक्रमों को निरस्त कर उन कार्यक्रमों को रिले करने का निर्णय ले सकें. कार्यक्रम विवरण की ये रिकॉर्डिंग डबिंग रूम में की जाती थी जिसमें तीन रिकार्डर लगे रहते थे.

हर स्टूडियो की लाइन इस रूम में आती थी और एक कंसोल पर कुछ बटन लगे हुए थे जिनको दबाकर आप किसी स्टूडियो में चल रहे प्रोग्राम को रिकॉर्डर पर लेकर उसे रिकॉर्ड कर सकते थे. इस कंसोल की एक कमज़ोरी मैंने पकड़ी और बस उस कमज़ोरी ने मुझे बहुत अच्छा मौक़ा दे दिया वर्मा साहब को झटका देने का. हुआ ये कि अचानक एक दिन 6 बजे जब आकाशवाणी बीकानेर से कार्यक्रम विवरण पढ़ा जा रहा था, धीमे स्वर में आकाशवाणी, बीकानेर के उद्घोषक की आवाज़ के पीछे पीछे न समझ में आने वाला कोई कार्यक्रम चल रहा था. कंट्रोलरूम में दौड़ भाग मच गयी मगर जैसे ही कार्यक्रम विवरण खत्म हुआ, पीछे चलनेवाला कार्यक्रम भी रुक गया. इंजीनियर्स ने वार्ता स्टूडियो, जहां से प्रसारण होता था, का माइक बदल दिया ये सोचकर कि शायद माइक में कोई समस्या हो. अगले दिन फिर मेरी शाम की ड्यूटी थी. कार्यक्रम विवरण का समय हुआ और फिर उसके पीछे पीछे न समझ में आने वाला कुछ प्रसारित होने लगा. कंट्रोलरूम के इंजीनियर्स ने वर्मा साहब को फोन किया. वो बोले अभी एक बार स्टूडियो बदल दो तब तक मैं आता हूं. और हां मेरे लिए गाड़ी भेज दो.

ये सब होते होते पांच मिनट का कार्यक्रम विवरण समाप्त हो गया. प्रसारण को वार्ता स्टूडियो से नाटक स्टूडियो में स्थानांतरित कर दिया गया. वर्मा साहब तशरीफ़ ले आये और आते ही वार्ता स्टूडियो को पूरा खुलवा डाला. स्टूडियो के कनेक्शन उधेड़ते उधेड़ते रात के ग्यारह दस हो गए. सभा समाप्त हो गयी, मैं और उद्घोषक घर के लिए रवाना हो गए मगर वर्मा साहब और उनकी टीम के कुछ लोग रात भर स्टूडियो में लगे रहे. दूसरे दिन मेरी दिन में ड्यूटी थी. जब दस बजे ऑफिस पहुंचा तो सुना कि वर्मा साहब रात भर स्टूडियो में थे, सब कुछ ठीक हो गया है और अब कोई गड़बड़ नहीं होगी. उस दिन तो गड़बड़ होनी भी नहीं थी क्योंकि मेरी तो दिन की ड्यूटी थी और 5 बजे मुझे तो घर चले जाना था. बड़ी शान से वर्मा साहब ने हमारे डायरेक्टर साहब को बताया कि कुछ टेक्नीकल गड़बड़ी थी वार्ता स्टूडियो में, उसे ठीक कर दिया गया है.

दो दिन सब कुछ ठीक रहा. दो दिन बाद मेरी ड्यूटी फिर शाम की लगी और जैसे ही 6 बजे. आकाशवाणी, बीकानेर के उद्घोषक की आवाज़ के पीछे पीछे कुछ अस्पष्ट और न समझ आने वाले शब्द सुनाई देने लगे. कंट्रोलरूम फिर परेशान. वर्मा साहब भी रेडियो सुन रहे थे. उन्होंने भी वो सब कुछ सुना. 5 मिनट गुज़र गए. अगले दिन डायरेक्टर साहब ने उन्हें बुलाकर पूछा तो बोले, शायद स्टूडियो बिल्डिंग और ट्रांसमीटर के बीच की लाइन में लीकेज है. लगता है उसकी खुदाई करवानी पड़ेगी. डायरेक्टर साहब बोले, देखिये ये इंजीनीयरिंग का मामला है, क्या करना है, क्या नहीं करना है वो आप जानें. मगर जैसे भी हो जल्दी से जल्दी इसे ठीक करवाइए.

उस मीटिंग में गर्दन झुकाए मैं भी बैठा हुआ था. मन ही मन मुझे मज़ा तो आ रहा था मगर न जाने कैसे मन के भाव चेहरे पर उभर आये. मेरे डायरेक्टर साहब ने पूछा क्या हुआ महेन्द्र ? तुम मुस्कुरा क्यों रहे हो? मैं एकदम हड़बड़ा गया. बड़ी मुश्किल से अपने आप पर काबू करते हुए मैंने कहा, नहीं सर कोई बात नहीं है.

स्टूडियो बिल्डिंग और ट्रांसमीटर में करीब सात किलोमीटर का फासला था. स्टूडियो से लेकर ट्रांसमीटर के बीच टेलीफोन लाइन बिछी हुई थी. जो प्रोग्राम स्टूडियो में बजाया जाता था, वो उस टेलीफोन लाइन के ज़रिए ट्रांसमीटर तक आता था और यहां से प्रसारित हो जाता था. वर्मा साहब ने हर तरह से अपना दिमाग लगा लिया मगर कार्यक्रम विवरण के पीछे आने वाली वो आवाजें नहीं रुकीं. मुझे लग रहा था कि इस तरह किसी दिन तो मैं पकड़ा ही जाऊंगा क्योंकि लोगों के दिमाग में कभी तो आ ही जाएगा कि ये गड़बड़ी उसी दिन होती है जब शाम की ड्यूटी पर मैं होता हूं. इसलिए कई बार बिना काम ही रुक कर शाम की ड्यूटी वाले को मदद करने के बहाने मैं अपनी कारस्तानी कर देता था.

आखिरकार वर्मा साहब ने टेलीफोन लाइन खुदवानी शुरू कर दी कोई दो किलोमीटर की खुदाई हुई थी कि मैंने अपनी कारस्तानी रोक दी. अब शाम का कार्यक्रम बिना किसी विघ्न के प्रसारित हो रहा था. दो तीन दिन बाद वर्मा साहब ने खुदाई रुकवा दी और घोषणा कर दी. लीकेज मिल गया है.. उसे ठीक कर दिया है और अब प्रसारण बिल्कुल ठीक होगा.

 

मैं मन ही मन मुस्कुराया. जिस तरह वर्मा साहब ने मेरी बेइज्ज़ती की थी, मैं उन्हें अब भी माफ करने के मूड में नहीं था. 5-6 दिन बाद फिर से कार्यक्रम विवरण के पीछे आवाजें आने लगीं. इस बार बात अखबारों तक जा पहुंची. अखबार नमक-मिर्च लगाकर ख़बरें छापने लगे. अब वर्मा साहब थोड़ा घबराए मगर फिर भी उनकी अकड़ अपनी जगह क़ायम थी. मीटिंग में बोले एक जगह लीकेज ठीक कर दी गयी थी मगर शायद कहीं और भी लीकेज रह गयी है. मैं और खुदाई करवाऊंगा, अगर फिर भी ठीक नहीं हुआ तो पूरी लाइन चेंज करवानी पड़ेगी. मैंने सोचा अब बहुत ज़्यादा हो रहा है. एक वर्मा साहब को सबक सिखाने में सरकार का बहुत नुकसान हो जाएगा अगर इन्होने सात किलोमीटर की खुदाई करवाकर पूरी लाइन बदलने का निर्णय ले लिया तो. वो बस आगे खुदाई करवाने की तैयारी कर ही रहे थे कि एक दिन सुबह सुबह मैं उनके कमरे में पहुंचा और कहा सर नमस्कार. उन्होंने गर्दन उठाई और अजीब सी नज़रों से देखते हुए बोले हम्म, कहिये क्या बात है?

मैंने कहा सॉरी सर अगर आप इसे इंजीनियरिंग मामलों में टांग अड़ाना न समझें तो. मैं आपको आश्वस्त करना चाहूंगा कि अब वो आवाजें नहीं आएंगी आप बेफिक्र रहिये. और प्लीज़ अब खुदाई मत करवाइए और न ही लाइन चेंज करवाने की सोचिये. उनके चेहरे पर पसीने की बूंदें छलछला उठीं. वो दस सेकंड चुप रहे और फिर गर्दन उठा कर बोले

अच्छा. तो ये आपका काम था.
मैंने कहा जी.
आपने ऐसा क्यों किया और कैसे किया?
आपने इतने लोगों के सामने मुझे बेइज्ज़त किया तो मुझे गुस्सा आ गया.
मगर आपने ये किया कैसे?

मैंने उन्हें बताया कि डबिंग रूम के कंसोल में एक कमज़ोरी है. स्टूडियोज़ के प्रोग्राम को तो वहां की मशीनों पर रिकॉर्ड किया ही जा सकता है, डबिंग रूम की किसी भी मशीन पर कोई टेप चलाकर कंसोल पर दो बटन एक साथ दबाकर उस टेप पर रिकॉर्डेड प्रोग्राम को किसी भी स्टूडियो से निकलकर कंट्रोलरूम जानेवाले प्रोग्राम के साथ मिक्स किया जा सकता है. मैंने डबिंग रूम की इसी कमज़ोरी को काम में लिया. मैं 5.55 पर दिल्ली का कार्यक्रम विवरण रिकॉर्ड कर एक मशीन पर टेप को उलटा चला देता था और उसे वार्ता स्टूडियो की लाइन में मिक्स कर देता था. जब टेप को उलटा चलाया जाता है तो जो आवाज़ निकलती है वो बड़ी अजीब सी होती है और उसका लेवल इतना कम रखता था कि ये तो पता चलता था कि कोई बोल रहा है मगर किस भाषा में बोल रहा है ये समझ नहीं आता था.

ये सब सुनकर वर्मा साहब का मुंह खुला का खुला रह गया. बोले बस इतनी सी बात थी? मैंने कहा जी हां..मेरा मन तो था आपको और तंग करने का लेकिन मैंने सोचा कि इस तरह आप पूरी लाइन खुदवाएंगे और चेंज करवाएंगे तो बेकार में बहुत खर्च हो जाएगा. इसलिए मैंने आपको ये सब बता दिया मगर उम्मीद करता हूं कि अगर कोई भी कुछ कह रहा है तो कम से कम उसकी बात सुन तो लीजिए. वो इंजीनियर नहीं है तो क्या हुआ, हो सकता है उसकी राय में कुछ काम की बात हो. वर्मा साहब ने वादा किया कि आगे से वो किसी के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करेंगे मगर मुझसे भी ये वादा लिया कि जो कुछ इस बीच केन्द्र पर हुआ, उसके पीछे सच्चाई क्या थी, इसका किसी को पता नहीं लगेगा.

बस. इसके बाद आकाशवाणी, बीकानेर से प्रसारण बिल्कुल सही तरीके से, बिना किसी विघ्न के होने लगा. मैंने सबसे यही कहा कि वर्मा साहब ने सब कुछ ठीक कर दिया है. हर तरफ उनकी काफी वाहवाही हुई. अब तक मैंने इस वाकये को अपने सीने में दफन कर रखा था. आज वर्मा साहब अगर इस दुनिया में हैं और इत्तेफाक से मेरी ये सीरीज पढ़ रहे हों तो उनसे हाथ जोड़कर माफी चाहूंगा कि जिस बात को मैंने 35 बरस तक सीने में दफन रखा, आज उसे दुनिया के सामने रख दिया है.


'सोहनी बाई को रिकॉर्ड कर धन्य हुई मेरी जिंदगी'

56
शेयर्स

पेश है दी लल्लनटॉप की नई सीरीज रेडियो जुबानी की 8वीं किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.

पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी5वीं, छठी और 7वीं किस्त में आपने छोटे से बच्चे की रेडियो के लिए शुरुआती दीवानगी पढ़ी. अब पढ़िए कि जब एक सुरीला कलाकार अपने ही साज़ की भेंट चढ़ गया, जिसे वो अपनी ज़िंदगी से ज्यादा प्यार करता था.


 

अब मैं सादुल स्कूल में पढ़ रहा था. मेरा बैंजो वादन भी चल रहा था. स्कूल में मैं पढ़ाई के लिए कम और अपने बैंजो वादन के लिए ज़्यादा जाना जाने लगा था. पढ़ाई से इतर गतिविधियों में मेरे भाई साहब भी बहुत सक्रिय थे मगर चूंकि वो पढ़ाकू किस्म के रहे, उनका क्षेत्र रहा डिबेट, शतरंज और राजनीति. उन दिनों स्कूल कॉलेज में आज की तरह के चुनाव नहीं होते थे न चुनाव लड़ना सिर्फ गुण्डे बदमाशों का ही काम हुआ करता था.

मेरे भाई साहब छोटे कद के हैं, चश्मा छठी-सातवीं कक्षा में ही लग गया था. क्लास में अव्वल आया करते थे. सभी अध्यापकों के अत्यंत प्रिय छात्र. ओम प्रकाश जी केवलिया हम सब के अत्यंत प्रिय अध्यापक थे. मगर केवलिया साहब के सबसे प्रिय छात्र थे मेरे बड़े भाई राजेन्द्र मोदी. केवलिया साहेब ने उन्हें नाम दिया था- छोटा गांधी. क्लास में अव्वल आने पर उन्होंने मेरे भाई साहब को एक बहुत ही सुन्दर पुस्तक इनाम में दी थी, बन्दा बैरागी.

किस प्रकार बन्दा बैरागी देश के लिए शहीद होते है, इस पर पद्य में ये इतनी शानदार किताब थी कि इसकी कुछ लाइंस मुझे आज भी याद हैं. केवलिया साहब की प्रेरणा से ही भाई साहब स्कूल के प्रधानमंत्री पद के लिए खड़े हुए और बहुत अच्छे अंतर से अपने प्रतिद्वंद्वी सूर्य प्रकाश को मात दी. आदरणीय गुरुदेव ओम प्रकाश केवलिया का निधन अभी कुछ ही साल पहले हुआ है. इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूं कि हम दोनों भाइयों पर केवलिया साहब का अत्यंत स्नेह रहा. हां ये बात और है कि दोनों पर उनके इस अप्रतिम स्नेह के कारण अलग अलग थे.

भाई साहब पर उनके स्नेह का कारण उनका पढ़ाई में बहुत अच्छा होना था और मुझ पर उनका स्नेह मेरी स्टेज की गतिविधियों के कारण. हम दोनों भाई आज भी कभी साथ बैठते हैं तो केवलिया साहब को ज़रूर याद करते हैं. एक बात और बताऊं? उनके सुपुत्र गौतम केवलिया आज भी मेरी फेसबुक के दोस्तों की सूची में मौजूद हैं.

मेरा संगीत प्रेम ज़ोरों पर था. मैं बैंजो तो बजाता ही था, जब भी मौक़ा मिलता. कोशिश करता कि किसी दूसरे साज़ पर भी हाथ आज़माऊं. मेरे ताऊ जी लोकदेवता राम देव के बहुत बड़े भक्त थे. पश्चिमी राजस्थान में रामदेव की बहुत मान्यता है. भाद्रपद में भक्तों के जत्थे के जत्थे बीकानेर से एक सौ बीस मील यानि लगभग पौने दो सौ किलोमीटर की पैदल यात्रा करके आज भी जोधपुर ज़िले के रामदेवरा नामक स्थान पर पहुंचते हैं, जहां बाबा रामदेव का मंदिर बना हुआ है और एक बहुत गहरी बावली बनी हुई है. इस राम देवरा को बीकानेर और आस पास के क्षेत्रों में रूणीचा कहा जाता है और बावली को हमारे यहां बावड़ी कहते हैं.

हर साल दो बार इस जगह मेला भरता है, जहां दूर दूर से यात्री आकर इस बावड़ी में स्नान करते हैं और बाबा के दर्शन करते हैं. अरे इस जगह की एक खास बात तो मैंने आपको बताई ही नहीं. जानते हैं जब आप बाबा रामदेव के मंदिर में प्रवेश करते हैं तो मंदिर के अंदर एक मज़ार बना हुआ पाते हैं. सभी लोग इसी मज़ार की पूजा करते हैं और सुबह शाम मज़ार की आरती भी उतारी जाती है. इस मंदिर में जितने हिन्दू तीर्थ करने आते हैं उतने ही मुस्लिम ज़ियारत करने आते हैं. हिंदू इन्हें पुकारते हैं, रामदेव बाबा और मुसलमान इन्हें कहते हैं राम सा पीर.

आज तो ज़माना बदल चुका है, किसी मंदिर में कोई भी जा सकता है मगर इस मंदिर में कभी भी ऊंच-नीच, छोटे बड़े का भेद-भाव नहीं किया गया और हमेशा से ही हर धर्म, हर जाति के लिए इस मंदिर के द्वार खुले रहे हैं. ये बात कहां तक सच है कहां नहीं जा सकता. मगर लोग ऐसा कहते हैं कि यहां बहुत बड़े-बड़े पर्चे यानि चमत्कार होते थे. बावड़ी की रचना कुछ इस तरह की है कि ऊपर लोहे का एक जंगला लगा हुआ है, और एक तरफ से सीढ़ियां अंदर तक गई हुई हैं. कहा जाता है कि जब कोई चमत्कार होना होता था तो उस व्यक्ति को बाबा रामदेव पुकारते थे और वो व्यक्ति भागता हुआ उस बावड़ी की तरफ जाता था.

बावड़ी के जंगले का दरवाज़ा खुल जता था और वो व्यक्ति उस बावडी में कूद जाता था. कुछ ही पलों बाद वो सीढियां चढ़कर बाहर आता था पूरी तरह स्वस्थ होकर. कहा जाता है के हर साल इस मेले के दौरान इस तरह के कई पर्चे यानि चमत्कार होते थे और कई लोगों की आखें ठीक हो जाती थीं, कई लोगों को हाथ पैर मिल जाते थे और कई लोगों का कोढ़ ठीक हो जाता था. विज्ञान के युग में इस तरह की बातों पर विश्वास होना तो आसान नहीं है मगर बाबा रामदेव में पूरे राजस्थान और गुजरात की अत्यंत श्रद्धा है ये मानना ही पडेगा. मेरे मुम्बई आने पर एक बार संगीतकार आनंद जी से बात हुई तो उन्होंने बताया कि बाबा में उनकी ही नहीं स्वर्गीय कल्याण की भी बहुत श्रद्धा थी.

इन्हीं बाबा रामदेव के परम भक्त थे मेरे ताऊ जी . हर महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को उनके घर एक बड़ा आयोजन हुआ करता था जिसे जम्मा कहा जाता था. पास के ही एक गांव सुजानदेसर के मंदिर के (जहां ताऊ जी रोज पैदल फेरी देने जाया करते थे ), पांच-सात पुजारी शाम से पहले ही आकर इकट्ठे हो जाया करते थे. ढेर सारी गुड़ की लापसी या चावल और चने की दाल बनती थी और हम सब लोग मिलकर गुड़ की उस लापसी या चावल और दाल के स्वाद का आनंद उठाया करते थे. उसके बाद घर के बाहर बनी हुई एक बड़ी सी चौकी पर जाजम बिछाकर सब लोग बैठ जाते थे. एक थैली में से मजीरे जिन्हें हम छमछमा कहते थे सब बच्चों के हाथ में दे दिए जाते थे. बड़े मजीरों की जोड़ी, ढोलक और खडताल पुजारियों के सुपुर्द कर दी जाती थीं और उसी वक्त ताऊ जी अंदर से निकालकर लाते थे, वो चीज़ जो मुझे इस जम्मे में सबसे ज़्यादा आकर्षित करती थी.

वो था एक पुराना हारमोनियम, जिसे सिर्फ और सिर्फ जम्मे के दिन ही ओरे (बिल्कुल अंदर के कमरे) में से निकला जाता था. मैं बेमन से छमछमे बजाता रहता था मगर मेरी निगाह हारमोनियम पर अटकी रहती थी. मैं बैंजो तो बजाता ही था इसलिए हारमोनियम बजाना मेरे लिए बहुत मुश्किल नहीं था मगर फिर भी जो चीज़ हमारी पहुंच में नहीं होती, वो हमें ज़्यादा आकर्षित करती है. रात भर में कई बार जम्मा देने वाले पुजारियों के लिए चाय बनती और बार बार वो चिलम भी सुलगाते. ऐसे में मुझे मौक़ा मिल जाता हारमोनियम बजाने का. हारमोनियम बजाने वाले पुजारी चिलम सुलगाने लगते और कोई भजन शुरू हो जाता तो मैं आंखों ही आंखों में ताऊ जी से पूछता कि हारमोनियम मैं संभाल लूं? और वो आंखों ही आंखों में हामी भर देते थे और इस तरह मैं हारमोनियम संभाल लिया करता था.

एक दो भजन तक मैं हारमोनियम बजाता रहता, फिर तो पुजारी जी को सौंपना ही पड़ता. ये जम्मा रात भर चलता था. सुबह सुबह सभी पुजारी वापस सुजानदेसर लौट जाया करते. घर के सब लोग रात भर जागने के कारण अक्सर दूसरे दिन आराम करते मगर मेरे लिए वो दिन आराम करने का नहीं होता था क्योंकि उसके बाद तो वो हारमोनियम फिर से ओरे में रखा जाना होता था. वही एक दिन होता था जब मैं पूरी आजादी के साथ हारमोनियम बजा सकता था. इस प्रकार हारमोनियम पर भी मेरा हाथ थोड़ा साफ़ होने लगा था. लेकिन ये सब तभी हो पाता था जब छुट्टियों में ताऊजी परिवार सहित बीकानेर में रहते थे.

उन दिनों सेवानिवृत्ति की उम्र 57 वर्ष थी. अचानक राजस्थान सरकार ने सेवानिवृत्ति की उम्र घटा कर 55 बरस कर दी. हजारों लोग जो 55 और 57 के बीच के थे.. एक साथ घर भेज दिए गए. इन हजारों लोगों में मेरे ताऊजी भी शामिल थे. अब उन्हें बीकानेर लौटना ही था.ताऊ जी के तीन बड़े बेटे पहले से ही बीकानेर में रहने लगे थे, अब ताऊजी, ताई जी, गणेश भाई साहब, विमला, रतन, निर्मला और मग्घा को लेकर बीकानेर आ गए थे. विमला, निर्मला और मग्घा का दाखिला महिला मंडल स्कूल में और रतन का दाखिला सादुल स्कूल में करवा दिया गया मगर ताऊजी के आमदनी के स्रोत बहुत सीमित हो गए थे. बहुत सिद्धांतवादी रहे वो जीवनभर. उन्होंने कभी भी ट्यूशन व्यवस्था को बढ़ावा नहीं दिया. बोर्ड से उनके पास इम्तहानों की कॉपियां आया करती थीं जो सेवानिवृत्ति के बाद भी चालू रह सकती थी मगर नौकरी के आखिरी दिनों में पदमपुर में अपनी ही एक औलाद के हाथों वो कुछ इस तरह छले गए कि उनके हाथ से आमदनी का ये स्रोत हमेशा के लिए छिन गया.

अब उन्होंने एलएलबी की अपनी डिग्री को झाड़ पोंछकर निकाला और वकालत शुरू कर दी. बड़े ही जीवट के इंसान थे वो. बहुत सी भाषाओं पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ थी. वो संस्कृत, पालि और प्राकृत के भी बहुत अच्छे विद्वान थे और उनका हस्तलेख ऐसा सुन्दर था कि उसके सामने छपे हुए शब्द भी फीके लगते थे. शाम के वक्त मैं देखता वो पालि और प्राकृत भाषाओं के हस्तलिखित ग्रंथों की अपने हाथ से हूबहू वैसी ही प्रतियां बनाया करते थे. उन्होंने मुझे बताया कि बीकानेर में अगर चंद नाहटा जी की पांडुलिपियों की एक लायब्रेरी है. वो उस लायब्रेरी में मौजूद ग्रंथों की प्रतिलिपियां बनाकर रख रहे हैं ताकि शोधकर्ताओं को मूल पांडुलिपियों को छूना न पड़े.

ताऊ जी जब छुट्टियों में बीकानेर आते थे तो रतन, निर्मला और मग्घा तीनों अक्सर या तो मेरे घर रहते थे या फिर मैं उनके घर मगर रतन तो हर हाल में मेरे साथ ही रहता था. उन दिनों पता नहीं कैसे बीकानेर में मच्छर नाम की कोई चीज़ नहीं हुआ करती थी. गर्मी में मैं और रतन अपने मालिये (छत पर बना कमरा) की छत जिसे तिप्पड कहते हैं उसपर सोया करते थे. रात को जब हम दोनों अपने बिस्तर उठाये तिप्पड पर पहुंचते, चारों तरफ बिल्कुल शान्ति होती तो कई बार उस शान्ति को चीरती हुई एक सुरीली आवाज़ हमारे कानों से टकरा जाती और हम एक साथ या तो चिल्ला पड़ते जगदीश जी या फिर और भी ज़ोर से चिल्ला पड़ते सोहनी बाई. और बिस्तर तिप्पड पर जैसे तैसे फेंककर नीचे उतरते, एक दरवाज़े पर ताला लगाते और चल पड़ते शब्दभेदी बाण की तरह उस आवाज़ की दिशा में और सचमुच हम कभी रास्ता नहीं भूलते थे. और जा पहुंचते थे अपने टारगेट तक.

उन दिनों जोधपुर के एक कलाकार थे मोहनदास निम्बार्क जो जगह जगह घूम घूमकर रामदेव जी की कथा किया करते थे. अच्छा गाते थे मोहनदास मगर हमें जो चीज़ उनके गाने में चुम्बक की तरह खींचती थी वो थी उनके साथ बजने वाले क्लेरियोनेट की मधुर आवाज़. हम लोग जिस दिन पहली बार ये कथा सुनने पहुंचे तो देखा. दरम्याने कद का दुबला सा एक इंसान आखें बंद किये बड़ी तन्मयता से क्लेरिओनेट जैसे मुश्किल साज़ पर कुछ इस तरह अंगुलियां घुमा रहा है, जैसे कोई कुशल तैराक बड़े सुकून से किसी स्वीमिंग पूल में तैर रहा हो. मैं और रतन मंत्रमुग्ध क्लेरिओनेट की उस मधुर आवाज़ को सुनते रहे. थोड़ी देर में कलाकार ने आंखे खोलीं. हम सबसे आगे बैठे हुए थे. आंखें खोलते ही उनकी नज़र हमारे मंत्रमुग्ध चेहरों पर पड़ी.

वो मुस्कुरा पड़े. हम जैसे निहाल हो गए. सुबह चार बजे तक हम वो कथा सुनते रहे. जब कथा समाप्त हुई तो क्लेरिओनेट के वो सुरीले कलाकार उठकर हमारे पास आये क्योंकि वो समझ गए थे कि हम उन्हें सुनने के लिए ही बैठे थे. अब हमारा परिचय हुआ. उन्होंने बताया कि उनका नाम जगदीश है और वो एक बैंड में काम करते हैं. हमारे पास तो अपना परिचय देने के लिए था ही क्या? सिवा इसके कि हम दोनों एक अच्छे घर के बच्चे हैं और पढ़ाई कर रहे हैं. बस उस दिन से जब भी जगदीश जी की क्लेरिओनेट की मधुर तान हमारे कानों में पड़ती थी हम भागे चले जाते थे उन्हें सुनने के लिए और अक्सर उनसे बात होती थी. ये दोस्ती जो मेरे छात्र जीवन में शुरू हुई वो तब तक चलती रही जब तक जगदीश जी परिस्थितियों से जूझते हुए क्लेरिओनेट जैसे मुश्किल साज़ को अपनी सांसों की भेंट चढ़ाते रहे. आखिरकार उसी क्लेरिओनेट ने बड़ी बेरहमी से उनकी सांसों को लील लिया जिसपर तैरती हुई उनकी अंगुलियां उस बेजान क्लेरिओनेट को साक्षात् सरस्वती में बदल देती थीं. मगर अफ़सोस..मैं उनके लिए बहुत कुछ करना चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया.

मैंने जब आकाशवाणी जॉइन किया. और 1977 में बीकानेर ट्रांसफर होकर आया तो बहुत कोशिश की कि जगदीश को किसी तरह स्टाफ आर्टिस्ट के तौर पर ले लिया जाए मगर मैं कुछ नहीं कर पाया क्योंकि तब तक वो बहुत कमज़ोर हो गए थे और विभाग की अपनी कुछ सरकारी किस्म की मजबूरियां थीं. आप शायद जानते होंगे कि इस तरह के साज़ बजाने वालों के फेफड़ों पर बहुत ज़ोर पड़ता है. उनके लिए ज़रूरी है कि वो अच्छा और संतुलित खाना खाएं वरना टीबी के कीटाणु तो हर वक्त वातावरण में रहते हैं, जैसे ही शरीर की शक्ति कम हुई वो तुरंत उस शरीर को अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं. आज टीबी का इलाज बहुत आसान है, बहुत मुश्किल तब भी नहीं था मगर अच्छा खाना उस वक्त भी इलाज की पहली शर्त थी और आज भी है.

आखिर वो सुरीला कलाकार अपने उस साज़ की ही भेंट चढ़ गया, जिसे वो अपनी ज़िंदगी से ज्यादा प्यार करता था. मुझे आज भी याद है, जैसी कि मेरी आदत थी कि मैं हर साज़ को बजाने की कोशिश किया करता था, छात्र जीवन में, एकाध बार मैंने जगदीश से क्लेरिओनेट लेकर बजाने की कोशिश की तो उन्होंने क्लेरिओनेट देने से मना तो नहीं किया लेकिन वो बोले, नहीं महेन्द्र जी, आपके लिए और बहुत साज़ हैं. आप कुछ और बजाइए. ये साज़ ज़िंदगी का साज़ नहीं. मौत का साज़ है.

उस वक्त मैं कुछ नहीं समझा था कि जगदीश जी ने ऐसा क्यों कहा मगर थोड़ा बड़ा हुआ तो बहुत से फूंक का साज़ बजाने वाले कलाकारों का हश्र देखा तो उनकी बात समझ में आई.
दूसरी आवाज़ जिसे सुनकर मैं और रतन खुशी से चिल्ला पड़ते थे. वो थी सोहनी बाई की आवाज़. दुबली पतली काया. चेहरे पर हल्का सा घूंघट और हाथ में तम्बूरा लिए हुए बड़ी सादगी से तान खींचती हुई सोहनी बाई. हम लोग आवाज़ की सीध में भागते हुए जा पहुंचते थे उस जागरण में जहां सोहनी बाई गा रही होती थीं. लगता था मीरा फिर से अवतार लेकर आ गयी हों इस धरती पर. सच बताऊं मेरे जीवन में तीन लोगों में मुझे मीरा के दर्शन हुए हैं. जुथिका रॉय जी, सोहनी बाई और महादेवी वर्मा. महादेवी जी के साथ अपने अनुभव मैं तब लिखूंगा जब कि आकाशवाणी इलाहाबाद की बातें लिखूंगा.

सोहनी बाई की आवाज़ में कोई खास हरकत या गायकी नहीं थी. बहुत ही सीधा सीधा गाती थीं वो मगर दो चीज़ें ऐसी थीं जो उनके गाने को खास बना देती थीं. एक उनकी आवाज़ में ग़ज़ब का मिठास था और दूसरा समर्पण. वो सिर्फ लोक भजन गाती थीं और उनका भजन सुनकर ऐसा लगता था कि ईश्वर के प्रति वो इस क़दर समर्पित हो गई हैं कि स्वयं उनकी आत्मा परमात्मा का हिस्सा हो गयी हैं. मेरे कानों में आज भी उनका वो भजन गूंज रहा है, म्हाने अबके बचा ले म्हारी माय बटाऊ आयो लेवाने..

सीधा सीधा शब्दार्थ लें तो एक बेटी अपनी मां से कह रही है कि हे मां तेरा दामाद मुझे लेने आ गया है तू मुझे इस बार बचा ले. मगर दरअसल ये मां, दामाद और बेटी, ये सब तो प्रतीक हैं. मृत्यु के आगमन पर इस दुनिया से जाती हुई आत्मा वेदना से तड़पती है और कहती है. कोई तो मुझे मृत्यु से बचा ले.

मैं और रतन सोहनी बाई के भजन सुनने बैठते तो कब सुबह हो जाती हमें पता ही नहीं चलता. इसके बरसों बाद 1977 में जब मैं उदयपुर से ट्रान्सफर होकर बीकानेर आया और सबसे पहली बार सोहनी बाई को रिकॉर्ड किया तो मुझे लगा मेरा जीवन धन्य हो गया.

न कोई आलेख, न कोई कागज़ का टुकड़ा, न कोई लंबा चौड़ा लवाज़मा. बस हाथ में एक तम्बूरा और एक ढोलक. कभी कभी दयाल पंवार जैसे कोई कलाकार हारमोनियम लेकर बैठ गए तो ठीक नहीं तो किसी साज़ की मांग नहीं. हर भजन के आखिर में या तो आता था, कहे कबीर सुनो भाई साधो. या फिर मीरा के प्रभु गिरधर नागर.

अब ये पूछने की तो गुंजाइश ही नहीं रहती कि ये किसका भजन है. एक बार मैंने पूछा, बाई आपको इतने भजन याद कैसे रहते हैं? ये जो आपने अभी गाया वो मीरा का भजन था? वो बड़ी सरलता से बोलीं. हुकुम. मीरा बाई रो ई है (हुकुम मीरा बाई का ही है.)मैंने कहा लेकिन कभी सुना नहीं ये भजन. वो थोड़ा घबरा गईं और बोलीं अन्दाता म्हनै कीं ठा नईं है (अन्नदाता मुझे कुछ भी पता नहीं है) अब मैं चकराया. मैंने फिर भी मुलायमियत से कहा बाई कहीं ऐसा तो नहीं है कि आप खुद भजन लिख लेती हैं और मीरा बाई और कबीर दास जी के नाम से गा देती हैं .घूंघट की ओट से वो हलके से मुस्कुराईं और बोलीं म्हारी काईं औकात सा ? मैं तो साफ़ अनपढ़ हूं.

म्हने दसतक करना ई कोनी आवै. हूं काईं लिख्सूं ? (मेरी क्या औकात साब? मैं तो बिल्कुल अनपढ़ हूं. मुझे तो दस्तखत करने भी नहीं आते. मैं भला क्या लिख सकती हूं?) मैंने कहा सच सच बताइये कि फिर आखिर बात क्या है? तो वो हाथ जोड़कर बोलीं भगवान री सौगन म्ह्नै कीं ठा नईं है. हूं तंदूरो नईं उठाऊं जद तईं म्हनै कीं पतों नईं रैवे कि मैं काईं गासूं पण तंदूरो उठाता ईं बा मावडी या बो बाबो जाणै हिवडेमें काईं उपजावै के आप ऊं आप जिको म्हारै मूंडै मैं आवै हूं गा दूं. (जब तक मैं तंबूरा नहीं उठाती हूं, मुझे कुछ पता नहीं होता कि मैं क्या गाऊंगी मगर बस तम्बूरा हाथ में लेते ही या तो वो मां(मीरा) या वो बाबा(कबीर) हिवडे में उतर के जो कुछ उसमें उपजा देते हैं, मैं गाती चली जाती हूं) हुकुम जिकी चीज नै हूं समझूं ई नईं बा म्हारी कियां हूं सकै? बा या तो बीं मावडी री हू सकै या फेर बीं बाबै री (हुकुम जिस चीज़ को मैं समझ ही नहीं सकती वो चीज़ मेरी कैसे हो सकती है?

वो या तो उस मां मीरा बाई की हो सकती है या फिर उस बाबा कबीर दास की). उनकी आवाज़ से लगा उनकी आंखें छलछला आई हैं. मुझे लगा इस विषय में और कुछ कहना उनका दिल दुखाना होगा. वैसे भी मीरा बाई तो राजस्थान की धरती पर पैदा हुईं थीं मगर देश के हर हिस्से में मीरा बाई के भजन लोक कलाकारों द्वारा अलग अलग रूप में गाये जाते रहे हैं. कौन कह सकता है कि कौन कौन से भजन उनके खुद के रचे हुए हैं और कौन कौन से भजन महज़ उनके ऊपर घनघोर आस्था रखने वाले लोक कलाकारों के हृदयों ने रच दिए हों. मैंने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और..मुझे लगा, मुझे आज मीरा बाई के दर्शन हुए हैं.

आज वो सोहनी बाई हमारे बीच नहीं हैं. राजस्थान के बाकी केन्द्रों पर तो उनकी शायद ही कोई रिकॉर्डिंग होगी, पता नहीं आकाशवाणी बीकानेर पर भी उनके भजनों के कितने टेप्स इरेज़ कर, उनपर कमर्शियल रिकॉर्ड कर लिए गए होंगे, क्योंकि अब तो आकाशवाणी के हर केन्द्र पर पैसा कमाने पर ही ज़ोर दिया जाता है ना? आकाशवाणी कभी कला और कलाकारों का अवश्य ही पोषक रहा है मगर पिछले काफी समय से ज़्यादातर इस पर अधकचरे अफसर ही काबिज रहे हैं, जिन्हें न कला की समझ होती है और न ही अफसरी की तमीज़ वरना डेढ़ डेढ़ घंटे तक के मेरे पचासों ऐसे नाटक एक ही दिन में श्याम प्रभू एरेज़ नहीं करवा देते जिन्हें तैयार करने में कोटा के 30-40 कलाकारों ने एक एक महीने का वक्त दिया था. खैर ये कहानी फिर सही.

हां अब भी जब कभी बीकानेर जाता हूं और इत्तेफाक से रतन भी श्री गंगानगर से आया हुआ होता है, हम दोनों छत पर जाकर लेटते हैं तो दिल करता है, काश एक बार फिर जगदीश की क्लेरिओनेट की मधुर आवाज़ या फिर सोहनी बाई की ह्रदय के अंदर तक उतर जाने वाली तान सुनाई दे जाए. मगर बीछवाल औद्योगिक क्षेत्र में बने हमारे नए घर की छत पर पूरी रात या तो कारखानों की खर्र खट खर्र खट सुनाई देती है या फिर पास ही बने लालगढ़ रेलवे स्टेशन पर खड़ा कोई डीज़ल इंजन बीच बीच में चीख पड़ता है.

'किसी काम के नहीं होते महाराजाओं के सजे घोड़े'

33
शेयर्स

पेश है दी लल्लनटॉप की नई सीरीज रेडियो जुबानी की 9वीं किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.

अब तक आप इस सीरीज की कई किस्तें पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए कि जब एक 16-17 का लड़का लड़कियों के कॉलेज में घुसकर बजाने लगा बैंजो.


 

कितनी छोटी होती है इंसान की ज़िंदगी? शुरू में उसे इस बात का अहसास नहीं होता. बचपन में हर बच्चा जल्दी बड़ा होना चाहता है और इस बात में फख्र महसूस करता है कि वो बड़ा हो गया है. वो जब 4-5 साल का होता है, तब भी मां बाप के सामने तरह तरह से साबित करने की कोशिश करता है कि वो बड़ा हो गया है. जब प्राइमरी क्लासेज़ में आता है तब भी उसे लगता है, अब वो एलकेजी या यूकेजी में नहीं है, बड़ा हो गया है.

फिर जब छठी सातवीं में आता है तो उसे लगता है कि अब तो उसकी गिनती बडों में होनी ही चाहिए. यानी वो तब तक बड़ा होने के लिए जी जान से कोशिश करता है जब तक कि वास्तव में बड़ा नहीं हो जाता. जब सब ये मान लेते हैं कि वो बड़ा हो गया है और हर बात में टोकने लगते है, ऐसा मत करो, वैसा मत करो. अब तुम बड़े हो गए हो. तब उसके पांव के नीचे से ज़मीन खिसकने लगती है और वो अपने बचपन को मिस करने लगता है. बचपन को मिस करने का ये सिलसिला जीवन भर चलता है, ये बात अलग है कि जैसे जैसे बूढ़ा होता जाता है.

रेडियो जुबानी की पहली किस्त

बचपन के साथ साथ जवानी के दिनों को भी मिस करने लगता है. एक बात आपने महसूस की है या नहीं, मैं नहीं जानता, बचपन में समय की गति बहुत धीमी होती है शायद इसीलिए बच्चा जल्दी बड़ा होना चाहता है. मगर धीरे धीरे समय की गति बढ़ने लगती है और फिर वो बढ़ती ही जाती है. आप ज़रा याद करके देखिए 20 साल पहले घटी कोई घटना आपको काफी दूर लगती होगी मगर 10 साल पहले की कोई और घटना उससे आधी दूरी पर महसूस नहीं होगी, बल्कि आधी से बहुत कम दूरी पर लगेगी और 5 साल पहले की घटना तो ऐसा लगेगा कि कल ही घटी हो. यानी समय की गति समान नहीं रहती. जैसे जैसे ज़िंदगी में आगे बढते हैं, समय की गति भी बढ़ती जाती है. जब वो अंतिम दिन आता है, जब उसे इस दुनिया को छोड़कर जाना होता है तब उसे लगता है अरे, ज़िंदगी तो इतनी जल्दी गुज़र गई. मैं तो इसे ठीक से जी भी नहीं पाया. मुझे थोड़ा सा समय काश मिल सके. मगर उसे जाना होता है तो जाना ही होता है.

ऐसे में वो लोग बहुत सुखी रहते हैं जो भगवान में, धर्म में, धार्मिक मान्यताओं में, पुनर्जन्म में गहरा विश्वास रखते हैं क्योंकि उन्हें लगता है. ये शरीर छोड़कर मुझे तो बस दूसरे शरीर में जाना है. मैं पूजा करुंगा, धर्म कर्म करुंगा तो ईश्वर मुझे किसी अच्छे घर में जन्म देंगे. दान-धर्म करुंगा तो मेरा अगला जन्म सुधर जाएगा. वगैरह वगैरह, मगर हर चीज़ को तर्क की कसौटी पर कसने वाले इंसान इन सब बातों पर विश्वास नहीं कर सकते. जीवन के इस दर्शन की शुरुआत उसी वक्त हो जाती है जब बच्चा बहुत छोटा होता है. वो अपने आस पास जो कुछ होता है उसे देखता है और ईश्वर, धर्म, समाज, स्वर्ग, नर्क, पुनर्जन्म, पूजापाठ इन सबके बारे में उसके विचार बनने लगते हैं. मैंने बचपन से देखा कि मेरे पिताजी बहुत मन से दुर्गा की पूजा किया करते थे. उनसे मेरे भाई साहब ने और मैंने भी ये संस्कार लिए मगर मेरे पिताजी कभी भी पंडितों की पोंगापंथी को स्वीकार नहीं करते थे. स्वर्ग, नर्क, धर्म, कर्म, इन सबको वो विज्ञान की कसौटी पर कसकर फेल कर चुके थे.

रेडियो जुबानी- 2

मैं भी इन सब बातों पर कभी विश्वास नहीं कर पाया. मेरे पिताजी ने कालांतर में जब मेरी मां की मृत्यु हुई तो पूजा पाठ करना बिल्कुल बंद कर दिया. हालांकि पूजा-पाठ में मेरा बहुत विश्वास कभी नहीं रहा मगर जब उन्होंने पूजा-पाठ करना छोड़ा तो उनके साथ ही साथ मैंने भी पूजा-पाठ को तिलांजलि दे दी.

मेरे भाई साहब आज भी नियमित रूप से पूजा करते हैं मगर जब भी उनसे इस बारे में बात होती है तो वो कहते हैं यार इतने सालों का एक रूटीन बना हुआ है उसे तोड़ने का मन नहीं करता, इसके अलावा और कोई बात नहीं है. स्कूल में पढ़ता था, घर में हर तरह के त्यौहार मनाये जाते थे. मगर मेरे पिताजी उन त्योहारों के सामाजिक पक्ष पर ही ज़ोर देते थे. धार्मिक पक्ष को हंसी में उड़ा देते थे. नतीजा ये हुआ कि मेरे दिमाग़ में भी धीरे धीरे बैठने लगा कि ईश्वर कुछ नहीं होता. ईश्वर की रचना लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए की और उसके नाम पर अपना पेट भरते हैं. और 9वीं 10वीं कक्षा में पहुंचते-पहुंचते पूरी तरह नास्तिक हो गया.

इसी समय में मैंने एक तरफ जहां सुकरात, प्लेटो, हैरेक्लिटस जैसे ग्रीक दार्शनिकों को पढ़ना शुरू किया, वहीं सांख्य, बौद्ध, जैन, योग, चार्वाक, मीमांसा, न्याय आदि भारतीय दर्शनों को पढ़ना शुरू किया. इन सबका विवरण देना यहां मौजूं नहीं होगा, बस इतना कहूंगा कि सबसे ज़्यादा अपने आपको तर्क पर आधारित कहने वाला न्याय दर्शन भी मुझे कोई रास्ता नहीं दिखा सका और मैं पूरी तरह से नास्तिक हो गया ऐसे में मैंने नीत्शे को पढ़ा तो लगा शायद जो नीत्शे की सोच है वो सच्चाई के ज़्यादा करीब है. मैं आज भी नास्तिक हूं और मरते दम तक रहूंगा .

हालांकि मैं जानता हूं कि नास्तिक होना कितना तकलीफदेह है? आप के सामने कोई भगवान नहीं हैं, आपको बचाने कोई देवी देवता नहीं आयेंगे और आपके मरने के बाद आपका अस्तित्व मात्र आपके बाद की एक पीढ़ी तक घर में टंगी हुई एक तस्वीर तक सीमित हो जाएगा. वो भी अगर आपकी औलाद लायक हुई तो वरना वो आपकी नहीं, सिर्फ अपनी औलादों की तस्वीरों से अपने घर को सजाना पसंद करेंगे. यानी आपके इस दुनिया से जाने के बाद सब खत्म. आप ने चाहे कैसे भी कर्म किये हों, मृत्यु के पश्चात आपको उनका कोई लाभ नहीं होने वाला है. और आप इस विश्वास के साथ नहीं मर सकते कि ये तो सिर्फ शरीर का बदलना ही है.

रेडियो जुबानी की तीसरी किस्त

मैं फिर से दूसरे जन्म में इस धरती पर आऊंगा. बहुत डरावना लगता है न ये सोचकर कि मेरी मृत्यु के बाद मेरा कोई वजूद इस दुनिया में नहीं रहेगा. मैं हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो जाऊंगा. मगर क्या कर सकते हैं? आपने अपने जीवन का जो दर्शन तय किया है. वो आपकी सोच की जड़ों में इस तरह बैठ चुका होता है कि आप बहोत चाहकर भी नहीं बदल सकते. मेरे रेडियो के कई कार्यक्रमों में मेरी इस विचारधारा का असर साफ़ दिखा भी है और इस विषय पर अपने साथियों और अफसरों से इस विषय में टकराव भी हुए हैं मेरा मानना है कि धर्म और ईमान दो अलग अलग चीज़ें हैं. आप धर्म को न मानकर भी ईमानदार हो सकते हैं मगर ईमानदार हुए बिना धार्मिक होने का कोई मायने नहीं है बल्कि ईमान के बिना धर्म का कोई अस्तित्व ही नहीं हो सकता.

रेडियो जुबानी की चौथी किस्त

स्कूल में इस विषय पर कभी कोई बात होना बिल्कुल संभव नहीं था. अगर किसी अध्यापक से जीवन, दुनिया, ईश्वर, इन विषयों पर बात करने की कोशिश करते तो वो डांटकर बिठा देते और हंसी उड़ाते कि पढाई तो होती नहीं जीवन को समझने की कोशिश कर रहे हैं. मैथ्स के हमारे एक टीचर थे डी पी मित्तल साहब. बड़े ही लहीम शहीम इंसान. हाथ में हर वक्त एक डंडा. बहुत ही कड़क अध्यापक माने जाते थे. क्लास में हम दो तीन लड़के ऐसे थे जो गणित के पीरियड में दुनिया भर की बातें करने को तैयार रहते थे सिवाय मैथ्स के.

मित्तल साहब ने एक दिन हम दोनों तीनों लड़कों को एक उपाधि दे डाली. उन्होंने कहा, राजा महाराजाओं की सवारी जब चलती है, तो उसमें कुछ बेहद खूबसूरत और सजे धजे घोड़े भी चलते हैं. इन्हें कोतल घोड़े कहा जाता है. ये और किसी काम के नहीं होते. इनकी सवारी नहीं की जा सकती, इन पर सामान नहीं ढोया जा सकता, ये युद्ध में भी काम नहीं आते. इन्हें तो बस सजा धजाकर रखिए. ये सिर्फ देखने में ही खूबसूरत लगते हैं. आप तीनों मेरे कोतल घोड़े हो.

संगीत और नाटक जैसी विधाओं में हर बार ढेरों तालियां और वाहवाही बटोरने वाले इंसान को कोतल घोड़े की ये उपाधि कैसी लगी होगी, आप समझ सकते हैं. लगा मैथ्स विषय को छोड़ दूं मगर फिर क्या करूंगा? ये समझ नहीं आ रहा था. ये मेरे जीवन का शायद बहुत कठिन वक्त था. दिल कर रहा था पढाई छोड़ दूं और कुछ ऐसा काम करुं जिस में संगीत हो मगर संगीत के आम कलाकारों की जो स्थिति देखता था, उसमें मैं अपने आपको फिट नहीं पाता था. इधर भाई साहब मेडिकल कॉलेज में पहुंच गए थे और घर में सब लोग उन्हें डॉक्टर कहकर पुकारने लगे थे. आस पास के सभी लोगों की निगाहें अब मुझपर थीं कि मैं क्या लाइन पकड़ता हूं. मेरे ताऊजी के एक लड़के ने तो मेरी मां से एक दिन कह भी दिया काकी, राजा (मेरे भाई साहब का घर का नाम) तो खैर मेडिकल कॉलेज में दाखिल हो गया है तो डॉक्टर बन ही जाएगा लेकिन महेन्द्र किसी दिन कुछ बनेगा तब देखेंगे.देखना ये हमारी ही तरह रहेगा

ये बात कुछ समय बाद मुझे मेरी मां ने उस वक्त बताई जब मैं रेडियो नाटक के उस ऑडिशन में पास हुआ जिसमें 350 लोग बैठे थे और सिर्फ 3 लोग पास हुए थे. बहुत खुश हुईं थीं वो और मुझे कहा था, लोग चाहे कुछ भी कहें तुम ज़रूर इस लाइन में अपना नाम कमाओगे. ज़रूरी थोड़े ही है कि सब लोग पढाई में ही नाम कमाएं. वैसे मैं आपको बता दूं कि हायर सेकेंडरी में मेरे 55 पर्सेंट नंबर बने थे. मुझे इन्जीनियरिंग में सिविल ब्रांच मिल रही थी जो मुझे कतई पसंद नहीं थी.

अब सवाल ये था कि आखिर हायर सेकेंडरी के बाद क्या करूँ मैं? संगीत के पीछे मैं पागल था. मैं चाहता था कि संगीत की शिक्षा लूं मगर मेरा दुर्भाग्य देखिये, उस ज़माने में बीकानेर में लड़कों के कॉलेज में संगीत नहीं था. संगीत सिर्फ और सिर्फ लड़कियों का विषय मन जाता था. अमर चंद जी जैसे कुछ कलाकार थे जो संगीत जानते थे मगर सिखाने में उनकी कोई रुचि नहीं थी. एक दिन मेरा दिमाग पता नहीं कैसे खराब हुआ, मैंने साईकिल उठाई और चल पड़ा महारानी सुदर्शना गर्ल्स कॉलेज की ओर. लड़कियों की कॉलेज में 16-17 साल के लड़के को अंदर कौन घुसने दे?

रेडियो जुबानी की पांचवीं किस्त

बाहर खड़े चौकीदार की बहुत मिन्नतें कीं कि बस एक बार मुझे प्रिंसिपल साहिबा से मिला दें. मैं इधर उधर देखूंगा भी नहीं. मैंने यहाँ तक कहा कि वो चाहें तो मेरी आंखों पर पट्टी बांध दें ताकि मैं किसी लड़की की तरफ न देख सकूं. आखिर उसे दया आई और वो मुझे प्रिंसिपल के कमरे में ले गया और डरते डरते कहा कि मैडम जी ये लड़का आपसे मिलने की बहुत जिद कर रहा था. उन्होंने जलती हुई नज़रों से मुझे देखा और बोलीं पुलिस को बुलाऊं? जानते हो लड़कियों की कॉलेज के अंदर आना तो दूर आस पास चक्कर लगाना भी जुर्म है और तुम्हें अंदर बंद किया जा सकता है. मैं घबराया मगर किसी तरह अपनी घबराहट पर काबू पाते हुए टूटे फूटे शब्दों में कहा, मैडम मैं संगीत पढ़ना चाहता हूं और संगीत आपकी कॉलेज के अलावा किसी भी दूसरे कॉलेज में नहीं है.

क्या मतलब? क्या तुम्हें लगता है कि तुम यहां संगीत पढ़ सकते हो?
मेरी आपसे रिक्वेस्ट है कि चाहे आप मुझे क्लास में मत आने दीजिए मगर इम्तेहान देने के लिए नाम को एडमिशन दे दीजिए क्योंकि लड़के प्रायवेट इम्तेहान भी नहीं दे सकते.
उन्होंने संगीत की लेक्चरर को अपने कमरे में बुलाया और कहा, ये लड़का बड़ी जिद कर रहा है कि इसे संगीत विषय के साथ बी ए करना है इसलिए इसे हम यहां एडमिशन दे दें.
वो लेक्चरर मुस्कुराईं और बोलीं, ये कैसे संभव है?
मैंने कहा, मैडम कोई रास्ता निकालिए न. संगीत मेरा जीवन है. अगर आप लोगों ने मना कर दिया तो मुझसे मेरा जीवन छीन जाएगा.
संगीत की मैडम बहुत मुलायमियत के साथ बोलीं, अच्छा बेटे तुम संगीत संगीत कर रहे हो, क्या तुमने संगीत किसी से सीखा है?
मैंने कहा, जी नहीं मैडम.
वो बोलीं अच्छा तुम संगीत में क्या कर सकते हो?

मैं उस वक्त तक बैंजो, हारमोनियम, बांसुरी बहुत अच्छी तरह बजाने लगा था और सितार, सारंगी और सरोद टूटा फूटा बजाने लगा था. मैं बोला, आप मुझे संगीत रूम में ले चलिए. जो कुछ में थोड़ा बहुत कर सकता हूं आपको उसकी बानगी दिखाता हूं. मुझे म्यूजिक रूम में ले जाया गया. साथ में बहुत से लैक्चरर्स का काफिला हो गया था, तमाशा देखने. मुझे एक बार तो लगा. मुझे फांसी के फंदे की ओर ले जाया जा रहा है और ये सारे तमाशबीन मुझे फांसी पर चढ़ाए जाने का तमाशा देखने जा रहे हैं.

रेडियो जुबानी की छठी किस्त

हम लोग म्यूजिक रूम में बैठे. मैंने डरते डरते हारमोनियम उठा लिया और मैडम से कहा आप किस सुर से गाएंगी? और क्या गाएंगी? मैं आपके साथ अलग अलग साज़ पर संगत करने की कोशिश करूँगा. उन्होंने बताया कि वो पांचवें काले से गाएंगी और दरबारी गाएंगी. मेरा भाग्य, मुझे एक सितार भी वहां मिल गया जो दरबारी के सुरों में मिला हुआ था और उनके सुर की बांसुरी भी मिल गयी. अब उन्होंने गाना शुरू किया. मैंने बारी बारी से उनके साथ हारमोनियम, बांसुरी और सितार बजाये. वो लगभग 15 मिनट गाती रहीं और मैं फुर्ती से बदल बदल कर साज़ उनके साथ बजाता रहा. 15 मिनट बाद जब वो रुकीं तो उनकी आंखें भरी हुई थीं.

उन्होंने मेरे सर पर हाथ फेरा और बोली शाबाश बेटा शाबाश तुमने ये सब कहां सीखा? मैं बोला बस रेडियो के साथ बजा बजा कर, लेकिन मैडम अगर आप बुरा न मानें तो एक चीज़ मैं भी सुनना चाहता हूं.
वो बोली हां हां ज़रूर, मगर क्या सुनाना चाहते हो?
मैंने कहा, ये मैं नहीं आप तय करेंगी.
उन्होंने अचरज से पूछा, क्या मतलब?
मैंने कहा जी मैडम अब हारमोनियम आप उठाइये और कोई भी राग जो आप चाहें छेडिए. मैं उसी राग में गाऊंगा, थोड़ा बहुत आलाप लूंगा, ख़याल तो शायद मैं नहीं जानता रहूंगा मगर तराना भी गाऊंगा और तानें भी लूंगा.

उन्होंने राग ललित छेड़ा और मैं उसमें खो गया. गाता गया गाता गया. आंखें बंद करके गाता ही चला गया. होश तब आया जब मैडम ने हारमोनियम बजाना रोका और पूरा म्यूजिक रूम तालियों की गडगडाहट से गूंज उठा. मैंने अपनी आंखें खोलीं. मुझे कुछ भी साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था.. तब महसूस हुआ कि मेरी आंखें आंसुओं से सराबोर थीं.म्यूजिक की मैडम और प्रिंसिपल मैडम दोनों ने कहा, हम बहुत प्रभावित हैं तुमसे मगर बेटा, हमारी भी कुछ मजबूरियां है, हम कुछ नहीं कर सकते. हां हमारे यहां जब भी कोई संगीत का प्रोग्राम होगा हम चाहेंगे तुम ज़रूर आओ.

मैं वहां किसी प्रोग्राम का निमंत्रण लेने नहीं गया था. मैंने उन्हें धन्यवाद कहा, उन दोनों के पैर छुए और अपनी साईकिल उठाकर धीरे धीरे कॉलेज के गेट से बाहर निकल गया, इस अहद के साथ कि अब मैं कभी नहीं गाऊंगा. मैंने संगीत को अपने जीवन से खुरच खुरच कर निकाल फेंका. अब भी वो खुरचन रह रह कर बहुत दुःख देती है जब उसमें बड़ी गहरी टीस उठती है.

'दुनिया का गोल होना सिवाय अंधविश्वास के कुछ नहीं'

52
शेयर्स

पेश है दी लल्लनटॉप की नई सीरीज रेडियो जुबानी की 10वीं किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.

अब तक आप इस सीरीज की कई किस्तें पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए कि दसवीं फेल बच्चा संभालने लगा लाखों, करोड़ों का बिजनेस. पर उसे पढ़ाने वाले को एक मलाल रह गया.


 

संगीत की दुनिया से बेइज्ज़त होकर निकल पड़ा था अपने जीवन का कोई और मकसद ढूढ़ने के लिए मैं. सिविल इंजीनियरिंग करके ईंट पत्थरों में अपने कलाकार को मैं कतई दफ़न नहीं करना चाहता था. अब सवाल ये था कि मैं आखिर करुं क्या? सबने सलाह दी कि मैं कॉलेज में जीव विज्ञान लेकर डॉक्टर बनने की कोशिश करुं. भाई साहब डॉक्टर बन ही रहे थे, उनकी सारी किताबें कॉपियां काम आ जाएंगी तो खर्च भी कम लगेगा. इधर पिताजी रिटायर होने वाले थे इसलिए ये भी एक बहुत ही अहम प्रश्न था. मैंने जीव विज्ञान की पढाई शुरू कर दी और साथ ही ट्यूशन पढ़ाना भी शुरू कर दिया. हालांकि मित्तल साहब की भाषा में कोतल घोड़ा रहा मगर फिर भी हकीकत ये थी कि गणित या किसी और विषय में मैं बहुत बुरा नहीं था. मैंने 10वीं क्लास के कुछ छात्रों को गणित, अंग्रेज़ी और साइंस पढ़ाना शुरू कर दिया.

मेरे तीन छात्र ऐसे थे जिन्हें मैं कभी नहीं भूल सकता और खास तौर पर एक छात्र सत्य प्रकाश तो ऐसा था कि मैंने उसपर कई झलकियां भी लिखीं जो आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से प्रसारित हुईं. एक शाम ताऊ जी ने मुझे बुलाया. मैं उनके पास पहुंचा तो देखा एक बुज़ुर्ग वहाँ बैठे हुए थे. मैंने उनपर नज़र दौड़ाई तो देखा,बिना ब्लीच किये लट्ठे का कुर्ता, धोती, बंद गले का कोट और सर पर थोड़ी मैली सी टोपी. पहली ही नज़र में लगा वो किसी प्राइमरी स्कूल के अध्यापक होंगे. मैंने हाथ जोड़कर नमस्कार किया. उन्होंने खड़े होकर मेरे नमस्कार का जवाब दिया. ताऊ जी ने परिचय करवाया महेन्द्र, ये पारीक जी हैं, पाबू पाठशाला के हैडमास्टर. इनका बेटा 10वीं में है. ये चाहते हैं कि तुम इनके बेटे को पढ़ा दो.

मैंने पूछा, किस किस विषय में उसे मेरी मदद की ज़रूरत है? इस बार पारीक जी ने मुंह खोला, दरअसल वो एक बार दसवीं में फ़ेल हो चुका है, ये उसका दसवीं में दूसरा साल है.

मैंने कहा, ओह, किस किस विषय में फ़ेल हुआ है?

वो थोड़े संकोच के साथ बोले, जी, सारे विषयों में. मैं उम्मीद कर रहा था कि वो साइंस, अंग्रेज़ी या गणित या इन तीनों विषयों का नाम लेंगे मगर वो तो कह रहे थे कि वो सभी विषयों में फ़ेल हुआ है. मैं लगभग चिल्ला पड़ा. क्या? सारे विषयों में फ़ेल हुआ है और आप चाहते हैं कि मैं उसे पढाऊं? क्या क्या पढ़ाऊंगा मैं उसे? आप तो खुद टीचर हैं, आप ही क्यों नहीं पढ़ाते उसे? वो रुआंसे से होकर बोले, हम मास्टरों की यही प्रॉब्लम है, हम दुनिया भर के बच्चों को पढ़ाते हैं मगर खुद अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाते. सुना है आप बहुत अच्छा पढ़ाते हैं अगर मेरा बेटा दसवीं पास कर ले तो एस टी सी करवाकर कहीं मास्टर लगवा दूंगा.

रेडियो जुबानी की पहली किस्त

पारीक जी अपनी कल्पना की आंखों से अपने बेटे को टीचर बना हुआ देख रहे थे. उन्हें क्या पता था कि उनके सुपुत्र सत्य प्रकाश के ललाट पर विधाता ने क्या लिखा है? और सच पूछिए तो मुझे ही कहां पता था कि जिस सत्य प्रकाश को पढ़ाने में मैं इतना हिचकिचा रहा हूं वो आगे जाकर किस रूप में मेरे सामने आकर खड़ा होने वाला है? खैर , मैंने पारीक जी से कहा आप कल सुबह सत्य प्रकाश को मेरे पास लेकर आइये और साथ में उसकी दसवीं की मार्कशीट भी. पारीक जी गदगद होकर बोले मेरा लड़का पढ़ने में कमज़ोर ज़रूर है मगर शरारती नहीं है, बहुत सीधा है. आपसे निवेदन है कि आप उसे पढ़ाने से इनकार मत करना, आपने पढ़ा दिया तो मुझे पता है, उसकी ज़िंदगी बन जायेगी और ये बाप आपको जीवन भर दुआएं देगा.

दूसरे दिन सुबह पारीक जी अपने बेटे को लेकर मेरे घर आये. सत्य प्रकाश ने आज्ञाकारी शिष्य की तरह मेरे पाँव छुए. मैंने उससे कहा अपनी मार्कशीट दिखाओ. उसने शरमाते शरमाते मार्कशीट मेरे सामने रख दी. मार्कशीट देखकर मेरा सर चकरा गया. किसी भी विषय में पास होने के आसपास मार्क्स होना तो बहुत दूर की बात थी, किसी भी विषय में दो अंको में भी मार्क्स नहीं थी. किसी विषय में दो किसी में चार किसी में पांच, बस इसी तरह के मार्क्स थे सत्य प्रकाश जी के. मैंने पारीक जी को कमरे से बाहर लाकर फिर से एक बार उनके सामने अपनी प्रार्थना रखी मास्टर जी प्लीज़ मुझे माफ कर दीजिए, मैं आपके बेटे को नहीं पढ़ा पाऊंगा. मगर पारीक जी तय ही करके आये थे कि उस बालक को मेरे गले डाल कर ही जायेंगे और मैं मना करता रह गया और वो सत्य प्रकाश को वहीं छोड़कर चले गए. और दूसरे दिन से सत्य प्रकाश मुझसे पढ़ने आने लगा. कहने को मैं सत्य प्रकाश को पढाता था मगर हकीकत ये है कि मुझे ही उस से हर रोज नई नई ज्ञान की बातें सीखने को मिलती थी जैसे दुनिया गोल है ये एक अंधविश्वास है.

एक दिन मैं उन्हें हिन्दी पढ़ा रहा था. अंधविश्वास की बात चल रही थी, उसने अंधविश्वास की परिभाषा बताई कि जिसपर अंधा भी विश्वास कर सके, उसे अंधविश्वास कहते हैं. मैंने कहा शाबाश, ज़रा उदाहरण दो, तो वो बोला, ये एक अंधविश्वास है कि दुनिया गोल है. 20 वीं सदी में एक छात्र कह रहा था कि दुनिया का गोल होना एक अंधविश्वास है. मैं रोज ही सत्य प्रकाश से कुछ न कुछ नया सीखता था.इसीलिये मैंने उसे शिष्य की बजाय अपना गुरु मान लिया था.  मैं सत्य प्रकाश को मास्टर जी पुकारने लगा था.

सत्य प्रकाश की एक बहुत बड़ी खासियत थी. उसे जब भी कुछ समझाया जाता, वो अपनी गर्दन हां में हिला देता था और उस से अगर पूछा जाता कि समझ में आया? तो उसका जवाब हमेशा हां में ही हुआ करता था, चाहे वो गणित का मुश्किल से मुश्किल सवाल हो, अंग्रेज़ी का जटिल से जटिल वाक्य हो या फिर साइंस का कोई लंबा चौड़ा फार्मूला. शुरू शुरू में जब वो हर बार मेरे ये पूछने पर कि क्या समझ में आ गया, वो जवाब देता था हाँ, तो मुझे लगता था दिमाग़ तो ठीक ही लगता है लड़के का, फिर इतने खराब नम्बर क्यों आये इसके? मगर एक दो दिन बाद मैंने जो कुछ पढ़ाया था उसमें से कुछ पूछा तो चुप.

मैंने कहा सत्य प्रकाश ये कल ही तो तुम्हें पढ़ाया है और तुमने कहा था तुम्हें समझ में आ गया. चुपचाप उसने गर्दन नीची कर ली. मैंने धीरज का दामन नहीं छोड़ा और प्यार से कहा देखो सत्य प्रकाश, अगर तुम्हें कुछ समझ न आये तो उसी वक्त पूछ लो, मैं तुम्हें दो बार, तीन बार, चार बार जितनी बार कहोगे समझाऊंगा. इसमें मुझे कोई दिक्क़त नहीं है, लेकिन जब मैं तुमसे वापस कुछ पूछूं तो तुम्हें चुप नहीं रहना है. तुम्हें जो कुछ पूछा जाए, उसका जवाब तो तुम्हें देना ही पड़ेगा. चाहे सही दो चाहे गलत. गलत होगा तो मैं ठीक करवा दूंगा लेकिन अगर इस तरह तुम चुप रहोगे तो मुझे गुस्सा आ जाएगा. और मेरा हाथ उठ जाएगा.

सत्य प्रकाश ने शर्माते हुए हां में गर्दन हिलाई तो मुझे लगा, ये समस्या हल हो गयी. मैं नहीं जानता था कि ऐसा कहकर मैंने अपने लिए ज्ञान के नए द्वार खोल लिए हैं. इसके बाद जो जो नया ज्ञान मुझे मिलेगा वो अद्भुत होगा. 1993-94 में जब मैं उदयपुर में था तो हमारे केंद्र निदेशक थे स्वर्गीय श्री रतन सिंह हरयानवी. बहुत मिलनसार, सज्जन और बुद्धिमान अफसर थे वो. उन दिनों मेरे साथ मेरा पुराना मित्र कुलविंदर सिंह कंग भी मेरे कहने पर उदयपुर ट्रांसफर करवाकर आ गया था, हालांकि उदयपुर में उसका और उसके परिवार का मन नहीं लगा और थोड़े ही दिनों बाद वो वहां से ट्रांसफर करवा कर दिल्ली चला गया.

हरयाणवी साहब मेरे रेडियो नाटक के प्रति लगाव से तो वाकिफ थे ही. मैंने उन्हें बताया कि कुलविंदर की हास्य लेखन पर बहुत अच्छी पकड़ है. इस पर वो बोले एक हास्य व्यंग्य का कार्यक्रम शुरू करते हैं जिसे आप दोनों मिलकर लिखो और प्रोड्यूस करो. हमने कहा जी. नाम तय किया गया डंके की चोट पर. आलेख तैयार करने की जिम्मेदारी कुलविंदर निभाता था और मैं श्रीमती इंदु सोमानी के साथ मुख्य पात्र के रूप में अभिनय भी करता था और इसे प्रोड्यूस भी करता था. इसके अलावा कभी कभी स्टाफ से इतर कलाकारों को भी कुछ विशेष रोल्स के लिए अनुबंधित किया जता था. कभी कभी जब कुलविंदर छुट्टी पर होता तो पर डंके की चोट पर लिखने की जिम्मेदारी भी मेरे ही सर आ जाती थी. ऐसे में मेरे काम आता था मेरे छात्र उर्फ मास्टर जी श्री सत्य प्रकाश जी द्वारा दिया गया अमूल्य ज्ञान और मैं उनका पुण्य स्मरण कर डंके की चोट के एकाध एपिसोड लिख डालता था. मैंने इसके लिए एक स्टॉक कैरेक्टर गढ़ा मेनका. मेनका का चरित्र बड़ी खूबसूरती से निभाती थीं, दीपशिखा दुर्गापाल, जो इस समय आकाशवाणी, अहमदाबाद में पोस्टेड हैं.

रेडियो जुबानी की दूसरी किस्त

हालांकि दीपशिखा अच्छी भली बुद्धिमान लड़की हैं मगर डंके की चोट रिकॉर्ड करते वक्त सत्य प्रकाश की आत्मा उनमें कुछ इस तरह उतर आती थी कि वो साक्षात सत्य प्रकाश का स्त्री संस्करण नज़र आने लगती थीं.जैसा कि मैंने पहले एक एपिसोड में लिखा कि इस मेनका में मैंने दो चरित्रों को मिलाया था. सत्य प्रकाश के अलावा जो एक और महान आत्मा थी वो थी मेरे सोहन बाबो जी के सुपुत्र पूनम भाई जी की. बहुत ही सीधे सादे इंसान थे पूनम भाई जी.

रेडियो जुबानी की तीसरी किस्त

दुबले पतले छरहरे बदन के पूनम भाई जी खाने के बड़े शौकीन थे. खाने बैठते थे तो उन्हें खाते देखकर अच्छे अच्छों को पसीना आ जाता था. उनके दुबले पतले शरीर को देखकर कोई सोच भी नहीं सकता था कि वो इतना खा सकते होंगे. मां बाप की इकलौती लाडली संतान थे वो. सोहन बाबो जी पुलिस में हैड कॉन्स्टेबल थे. पढ़ाई लिखाई में पूनम भाई जी एकदम ज़ीरो थे मगर उनपर पढाई लिखाई का कोई दबाव नहीं था. सोहन बाबो जी कहते थे, एक ही तो औलाद है मेरी. पढ़ेगा तो ठीक है नहीं पढ़ेगा तो भी कोई बात नहीं. सब पढ़े लिखे होंगे तो अनपढों की अलग दुनिया बसेगी क्या? बस पूनम भाई साहब मस्त. दिन भर गली में बच्चों के साथ खेलना और जो खाने का मन हो, फरमाइश कर देना. सोहन बाबो जी जब भी रात को घर लौटते थे तो रोज अपने सपूत के लिए कुछ न कुछ मिठाई ज़रूर लेकर आते थे. कई बार पूनम भाई जी को इंतज़ार करते करते नींद आ जाती थी.

रेडियो जुबानी की चौथी किस्त

पूनम भाई जी को नींद से जगाया जाता.बाबो जी उन्हें प्यार से आवाज़ देते, पूनमिया उठ, रसमलाई खा ले या चमचम खा ले या फिर दाल का सीरा खा ले और उसी वक्त उन्हें मिठाई खिलाई जाती. कभी कभार अगर उनका पेट खूब भरा हुआ होता या फिर बहुत ज़ोर से नींद लग रही होती तो वो कह देते ऊं ऊं ऊं.कुल्हड़ में डाल कर रख दो कल सुबह खा लूंगा. जब पूनम भाई जी 9-10 बरस के हुए तो सोहन बाबो जी का मन हुआ बेटे की शादी करने का. एक 6-7 बरस की लड़की उनके लिए तलाश की गयी और शादी का मुहूर्त निकाला गया. शादी का मुहूर्त देर रात का निकला.

9-10 बरस के पूनम भाई जी सजधज कर घोड़ी पर सवार हुए और खुश खुश लड़की वालों के घर बारात लेकर पहुंच गए. खुश क्यों न होते. शादी जो हो रही थी. सबने बताया कि तुम्हारी एक सुन्दर सी दुल्हन आयेगी और सबसे बड़ी बात ये कि इन दिनों उन्हें खाने को जी भर मिठाइयां मिल रही थीं. बारात तो समय से पहुंच गयी मगर फेरे तो देर रात होने वाले थे. तब तक पूनम भाई जी को नींद आ गयी. सारी बाकी की रस्में चलती रहीं और पूनम भाई जी सो गए. जब फेरों का वक्त हुआ तो सोहन बाबो जी ने आवाज़ लगाई पूनमिया, उठ.. फेरा खा ले (शादी के फेरे ले ले) हमारे पूनम भाई जी की तो रोज की आदत थी देर रात अपने पिताजी की ऐसी आवाज़ सुनने की, कभी ये खा ले, कभी वो खा ले, उन्होंने समझा फेरा भी कोई मिठाई ही होगी, तो आंखें बंद किये किये बोले कुल्हड़ में डाल कर रख दो, कल सुबह खा लूँगा. पूरी बारात ठठा कर हंस पड़ी और गाहे बा गाहे ये वाकया लतीफे की तरह बरसों सुना और सुनाया जाता रहा.

तो साहब मैंने सत्य प्रकाश को पढ़ाना शुरू कर दिया था. टाइम का बहुत पक्का था वो, हमेशा बिल्कुल सही टाइम पर आता था. मेरा पढ़ना लिखना माळिए(छत पर बने कमरे) में होता था. ठीक टाइम पर मेरी मां की आवाज़ आती. महेंदर. सत्य प्रकाश मैं कहता ऊपर भेज दीजिए और बालों में पाव भर तेल डालकर सँवारे गए पट्टे(राजस्थानी में एक खास तरह से बनाए गए बाल को पट्टे कहा जाता है), झकाझक सफ़ेद पतलून और इन किया हुआ वैसा ही झकाझक क़मीज़ और पांवों में साफ़ सुथरे जुराब. मैंने सत्य प्रकाश के पिताजी का जो रूप देखा था, उस से बहुत अलग मुझे लगा, ज़रूर सत्य प्रकाश की माता जी शऊर वाली महिला होंगी. आते ही नियम से अपना बस्ता टेबल पर रखकर नीचे झुककर दोनों हाथों से पैर छूता था, हाथों को माथे पर लगाता था और खड़ा हो जाता था, मैं उसे बैठने को कहता तो मेरे बैठने का इंतज़ार करता और जब मैं बैठ जाता तब कुर्सी पर बड़ी ही तमीज़ से बैठ जाता था.

रेडियो जुबानी की 5वीं किस्त

यहां तक के सारे काम बहुत नियमित रूप से होते थे. बस उसके बाद जो कुछ होता था, वो मुझे हर रोज ये सोचने पर मजबूर करता कि मैं आखिर इस भले मानुष को क्यों परेशान कर रहा हूं? एक रोज अंग्रेज़ी पढ़ा रहा था. मैंने पूरा पाठ पढ़ा दिया और सत्य प्रकाश से पूछा, समझ में आया, जो मैंने पढ़ाया? उसने अपनी स्टाइल में हां में गर्दन हिला दी. मैंने कहा सत्य प्रकाश, सही बताओ, समझ आया? उसने फिर अपनी गर्दन हां में हिला दी. मैंने कहा अच्छा पहला वाक्य क्या है ,पढ़ो ज़रा. उसने पढ़ा एयरोप्लेन इज़ फ़्लाइंग ओवर द हिल.

मैंने कहा शाबाश, अब ज़रा इसका हिन्दी में अनुवाद करो. उसने गौर से उस वाक्य को दो तीन बार पढ़ा. मैं उसकी फुसफुसाहट सुन रहा था. मैंने कहा, हां हां शाबाश कोशिश करो. अब सत्य प्रकाश जी के श्रीमुख से जो कुछ निकला उसे सुनकर कम से कम मेरे दो तीन जन्म तो अवश्य ही धन्य हो गए होंगे. सत्य प्रकाश ने इस अंग्रेज़ी वाक्य का अनुवाद किया था हवाई जहाज़ हिल रहा है. मैंने उसे अभयदान दे रखा था इसलिए कुछ भी नहीं कह सकता था. मैंने लंबी सांस ली और कहा शाबाश बेटा.

ये तो थी अंग्रेज़ी की कहानी. अब सुनिए गणित की दास्ताँ, मैंने सत्य प्रकाश को सारे पहाड़े रटवाये, जोड़, बाकी, गुणा, भाग, वो सारी चीज़ें सिखाईं जोकि तीसरी चौथी क्लास में सिखाई जाती हैं मगर एक बात मैं उसे बिल्कुल नहीं समझा पाया कि हज़ार से बड़ी भी कोई संख्या होती है. उसके सामने आप चाहे कोई भी संख्या रख दीजिए वो हज़ार से आगे जाता ही नहीं था. जैसे 23570 को सत्य प्रकाश पढ़ेगा तेईस हज़ार पांच हज़ार छः सौ अस्सी या फिर दो हज़ार पैंतीस हज़ार छः सौ अस्सी. मैं उसे समझा समझाकर हार गया मगर लाख और करोड़ का अस्तित्व सत्य प्रकाश ने कभी स्वीकार नहीं किया.

यही हाल उसका साइंस में था. वैसे तो वो कभी भी अपनी ओर से कुछ भी पूछता नहीं था मगर एक दिन वो बहुत अच्छे मूड में था. बोला सर एक बात पूछूं? मैंने कहा हां हां ज़रूर. तो वो बोला पानी को पानी कहने से काम चल सकता है तो उसे साइंस में H2Oकहने की क्या ज़रूरत है? मैंने कहा हां बेटा बड़ी ही बेवकूफियां होती हैं साइंस में.

सत्य प्रकाश के पिताजी बीच बीच में अपने बेटे की पढ़ाई का हाल चाल लेने आते रहते थे. मैं उनसे कहता, ज़रूरी नहीं है कि हर बच्चा पढ़ लिख कर बड़ा आदमी ही बने, सीधा सच्चा बच्चा है आपका, आप कोशिश कीजिये कि अच्छा इंसान बन जाए ये. रही रोजी रोटी की बात, तो हाथ का कोई हुनर इसे सिखा दीजिए, अपना और अपने परिवार का पेट भर लेगा. मास्टर जी हर बार बड़ी ही दयनीय मुद्रा में हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगते नहीं सर आपके सर कोई इलज़ाम नहीं दूंगा अगर ये फिर फ़ेल हो जाता है तो, मगर आप इसे पढ़ाते रहिये, मुझे पूरा भरोसा है, ये पास हो जाएगा. बस ये दसवीं पास हो जाए किसी तरह तो एस टी सी करवा दूंगा, मेरा बुढ़ापा सुधर जाएगा. मैं फिर निरुत्तर हो जाता.

मैं वैसे मूल रूप से बच्चों को अंग्रेज़ी, साइंस और गणित ही पढ़ाया करता था मगर, सत्य प्रकाश के पिताजी ने मुझसे वादा ले लिया कि मैं उसे हिन्दी और सामाजिक ज्ञान भी पढ़ा दूंगा. एक दिन मैंने उसे मीरा बाई के बारे में बताया और सामाजिक ज्ञान में इतिहास का एक पाठ पढ़ाया जिसमें मुग़लों के बारे में संक्षेप में बताया गया था. मैंने सब कुछ पढ़ाकर पूछा समझ में आ गया? उसने बड़ी सी हाँ में सर हिला दिया. मैंने कुछ होमवर्क दिया और वो पैर छूकर घर चला गया. अगले दिन जब वो फिर मेरे पास आया, मैंने होमवर्क की कॉपी देखी तो मैं हैरान रह गया. उसमें एक सवाल था, अकबर का पूरा नाम क्या था? उसने इसका जवाब लिखा था जलालुद्दीन गिरधर अकबर. मैंने पूछा ये क्या लिखा है? अकबर का पूरा नाम जलालुद्दीन गिरधर अकबर था? वो बोला जी हां और मीराबाई उनकी पत्नी थीं, तभी तो मीरा बाई ने भजन लिखा मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई. मुझे लगा कितना कष्ट पा रही होगी मीराबाई की आत्मा?

रेडियो जुबानी की छठी किस्त

खैर साहब. इसी तरह पढ़ाते पढ़ाते और उसके ज्ञान से अपने आपको कृतार्थ करते करते साल गुज़र गया.. इम्तेहान आ गए. जब इम्तेहान शुरू होने में बस दो दिन बचे थे कि नीचे से मेरी माँ की आवाज़ आई महेंदर.सत्य प्रकाश मैंने कहा ऊपर भेज दीजिए. थोड़ी देर में सत्य प्रकाश ऊपर आया, आकर बाकायदा पाँव छुए और खड़ा हो गया, मैंने कहा हाँ बोलो सत्य प्रकाश. क्या कुछ पूछना चाहते हो? उसने हाँ में गर्दन हिलाई.हैं मैं बहुत खुश हुआ कि चलो आज तो कुछ पूछने आया है क्योंकि वरना वो ज्ञान देता ही था, पूछता कुछ भी नहीं था. मैंने कहा बैठो. वो बैठ गया. एक कॉपी और पैन निकालकर मेरे हाथ में पकड़ा दिए. मैंने कहा हां बोलो क्या पूछना है? वो बोला परसों से इम्तेहान चालू होने वाले है, मुझे अंग्रेज़ी में अपना रोल नंबर लिखना सिखा दीजिए मैंने अपना सर पीट लिया मगर क्या करता बैठकर उसे अंग्रेज़ी में उसका रोल नंबर लिखना ही नहीं सिखाया उसका अभ्यास भी करवाया.

मुझे पूरा विश्वास था कि सत्य प्रकाश दसवीं में फिर फ़ेल होगा. वो किसी हालत में पास नहीं हो सकता. समय गुज़रा. एक दिन पता लगा कि दसवीं का रिज़ल्ट आ गया है. मुझे कोई उत्सुकता नहीं थी क्योंकि मुझे पता था वो पास नहीं होगा.इसलिए मैंने उस ओर कोई ध्यान नहीं दिया. तीन चार दिन बाद ही सत्य प्रकाश के पिताजी बड़े खुश खुश उछलते हुए मेरे घर आये और उस बुज़ुर्ग आदमी ने झुक कर मेरे पांव छू लिए. मैं कहता रह गया अरे अरे क्या कर रहे हैं मास्टर जी आप? क्यों पाप चढ़ा रहे हैं मुझपर?

वो आंखों में पानी भरते हुए बोले. आपने तो कमाल कर दिया सर? मैंने कहा क्या हुआ मास्टर जी?आखिर बात क्या है? उन्होंने सत्य प्रकाश की मार्कशीट निकाली और बहुत खुश होकर बोले देखिये, कहाँ तो पिछले साल उसके सारे पेपर्स में दो-दो चार-चार नंबर आये थे और इस बार सिर्फ तीन विषयों में दो-दो चार-चार अंको से फ़ेल हुआ है. अगर आप इस साल उसे और पढ़ा दें तो मुझे पूरा विश्वास है, इस बार वो ज़रूर निकल जाएगा. मैं हक्का बक्का. एकदम सन्न. समझ नहीं आ रहा था क्या जवाब दूं? एक पिता की आशाओं पर पानी फेरने का पछतावा भी हो रहा था मगर मैं महसूस कर रहा था कि अगर मैंने इस बार भी सत्य प्रकाश को पढाया तो मेरी खुद की पढ़ाई बिल्कुल चौपट हो जायेगी. मैंने शर्मिन्दा होते हुए सत्य प्रकाश के पिताजी से कहा, क्षमाप्रार्थी हूं मास्टर जी अब मैं आपके पुत्र को नहीं पढ़ा पाऊंगा, इस से मेरी पढ़ाई चौपट हो जायेगी.

उनका चेहरा एकदम उतर गया. उदास स्वर में वो बोले नहीं नहीं. अगर मेरे बेटे से आपके भविष्य को ख़तरा है तो मैं उसे आपके आस पास भी नहीं आने दूंगा. ईश्वर आपको खूब तरक्की दे. मेरे बेटे के भाग्य में जो लिखा है, उसे वो भोगना ही होगा. मैंने कहा आप मुझे अन्यथा न लें, मैं नियमित रूप से तो उसे नहीं पढ़ा पाऊंगा मगर हाँ उस से कह दीजिए कभी कुछ पूछना चाहे तो मेरे घर के दरवाज़े उसके लिए हमेशा खुले रहेंगे. मास्टर जी धीमे धीमे क़दम उठाते हुए चले गए.

मैंने सोचा मेरे जीवन का सत्य प्रकाश का ये चैप्टर यहीं समाप्त हो गया. मगर मैं गलत था. समय के गर्भ में बड़े बड़े चमत्कार छुपे रहते हैं जिसे इंसान कभी नहीं समझ सकता. वक्त गुज़रता रहा. एम ए किया, पत्रकारिता में पी जी डिप्लोमा किया और आकाशवाणी में आ गया. उन दिनों आकाशवाणी के प्रसारण निष्पादक की नौकरी पर एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन पर घूम रहा था. 1972 की बात है मेरी और मेरी पत्नी की पोस्टिंग उन दिनों सूरतगढ़ आकाशवाणी पर थी. मैं मेरी पत्नी और मेरा बेटा, हम तीनों बीकानेर में राजस्थान रोडवेज़ के बस अड्डे पर बैठे हुए बस का इन्तज़ार का रहे थे कि एक बिल्कुल ब्रांड न्यू जीप हमारे पास आकर रुकी. मैं कुछ समझ पाऊं उस से पहले ही ड्राइवर के पास की सीट से उतारकर एक नौजवान ने पहले मेरे पैर छुए और उसके बाद मेरी पत्नी के. मैंने चेहरे की तरफ देखा. और चौंक गया अरे.? ये तो सत्य प्रकाश है?

रेडियो जुबानी की 7वीं किस्त

उसने शायद मेरे मन की आवाज़ सुन ली, बोला जी सर मैं सत्य प्रकाश ही हूं. आप यहां कैसे बैठे हैं? मैंने उसे आशीर्वाद दिया और कहा मेरी पोस्टिंग इन दिनों सूरतगढ़ है. वहीं जाने के लिए बस का इंतज़ार कर रहे हैं हम लोग. वो बोला चलिए मैं आपको जीप से ड्रॉप करके आऊंगा. मैंने बहुत मना किया मगर वो नहीं माना. बोला सर आज जो कुछ भी हूं आपके आशीर्वाद से ही हूँ, मेरे होते हुए आप यहां बैठे हुए बस का इंतज़ार करते रहें और मैं जीप में बैठ कर चला जाऊं, ये कैसे हो सकता है?

आखिर मुझे उसकी बात माननी पड़ी. वो हमें सूरतगढ़ ड्रॉप करके आया. 170 किलोमीटर के रास्ते में खूब बातें हुईं. बातचीत हुई तो पता चला कि उसकी शादी जिस लड़की से हुई वो अपने मां बाप की इकलौती लड़की थी और उनके पास 15-20 ट्रक और 15-20 बसें थीं. सारा काम अब सत्य प्रकाश ही संभाल रहा था. सत्य प्रकाश के पिताजी रिटायर हो चुके थे और सत्य प्रकाश एक आज्ञाकारी पुत्र के रूप में उनकी जी भरकर सेवा कर रहा था. उसने बताया सर ये सच है कि मैं दसवीं तो पास नहीं कर सका मगर आपने ही मुझे इस योग्य बनाया कि मैं इतने बड़े बिजनेस को संभाल रहा हूं. और सर एक बात बताऊं? वो लाख और करोड़ की संख्याएं किताब में लिखी हुई देख कर मुझे कभी समझ में नहीं आती थीं, अब जब अपने हाथों से गिनने लगा तो सब समझ में आ गईं. मुझे उस दिन बहुत अफ़सोस हुआ. मैं अगर एक साल और उसे पढ़ा देता तो शायद वो दसवीं पास कर लेता और उसके मन में ये टीस नहीं रहती कि वो दसवीं पास नहीं कर सका

'चौमासै में माछर खावै, अै दुःख जासी मूआं'

49
शेयर्स

पेश है दी लल्लनटॉप की नई सीरीज रेडियो जुबानी की 11वीं किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.

अब तक आप इस सीरीज की कई किस्तें पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए कि जब चार दोस्त मिलकर फिल्म देखने पहुंचे और वहां मिले अड़ियल अंकल.


 

बचपन से पिताजी के मुंह से हमेशा एक अंग्रेज़ी कहावत सुना करता था कि अगर आपने पैसा खो दिया तो कुछ भी नहीं खोया. अगर सेहत खो दी तो बहुत कुछ खो दिया और अगर चरित्र खो दिया तो सब कुछ खो दिया. यानी इस दुनिया में सबसे कम महत्त्व पैसे का है. हमेशा कोशिश की कि इस बात पर पूरा भरोसा किया जाए लेकिन ज़िंदगी जो पाठ पढ़ाने की कोशिश पग पग पर करती है, वो इन कहावतों से बहुत अलग होते हैं. जैसे जैसे बड़ा होता गया, ये बार बार महसूस किया.

फिर भी जो संस्कार माता-पिता से मिले वो इतनी गहराई तक उतरे हुए थे कि हर बार ज़िंदगी के हर ऐसे पाठ को नकारने की हिम्मत न जाने कहां से आ गई. जिसने ये सिखाने की कोशिश की कि पैसा ही इस दुनिया की सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ है और रिश्ते-नाते, प्यार-स्नेह, सब जिस धरातल पर टिके हुए हैं, उस धरातल का नाम है अर्थ. बचपन वैसे तो आराम से गुजरा मगर सीमित साधनों के बीच. पिताजी की कोआपरेटिव डिपार्टमेंट की नौकरी हमें दो वक्त की रोटी और सरकारी स्कूल की पढ़ाई तो दे सकती थी मगर हम न प्राइवेट स्कूल में पढ़ने के सपने देख सकते थे और न ही महंगे कपड़ों से भरी आलमारियों की कल्पना कर सकते थे.

सन 1962 में पिताजी का तबादला बीकानेर हो गया था. घर में उस वक्त तक न बिजली थी और न ही पानी का कनेक्शन. मुस्लिम भिश्ती चमड़े की मशक में भरकर पानी लाया करते थे, जिसे उस ज़माने के छुआछूत मानने वाले बड़े से बड़े पण्डित भी पिया करते थे. नहाने धोने का पानी चमड़े की पखाल में भरकर ऊंट पर रखकर लाया जाता था. खाना बनाने के लिए फोग की लकडियां टाल(लकड़ी की दुकान) से खरीदकर लाई जाती थी. सर्दी के मौसम में जब ज़्यादा लकड़ी की ज़रूरत रहती थी. हम लोग बाहर खड़े होकर गावों से आने वाले लकड़ी के लादों(ऊंट पर लादे हुए लकड़ी के गट्ठर) का मोल-भाव करते थे और वाजिब लगने पर पूरा लादा खरीद लिया करते थे.

घर में गाय थी, उसके गोबर से थापी गयी थेपड़ियां(उपले) भी चूल्हे में लकडियों के साथ साथ जलाने के काम में ली जाती थीं. सर्दी के मौसम में उस चूल्हे और उल्हे (चूल्हे के पीछे की ओर बने मिनी चूल्हे) के पास बैठकर खाई मां के हाथ की बाजरे की रोटियों और उस पर लगे ताज़े मक्खन का स्वाद आज भी मुंह में मौजूद है. कई बार जब लकडियां या थेपड़ियां गीली होती थीं तो पूरा किचन धुंए से भर जाता था. तब किचन का एक टूल बहुत काम आता था जिसे भूंगळी कहा जाता था. ये पाइप का एक टुकड़ा होता था जिस से फूंक मारकर चूल्हे की आग को चेताया जाता था.

उस ज़माने में बिना भूंगली के किसी रसोईघर की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. चाहे कितना भी धुंआ हो मैं, भाई साहब और पिताजी सर्दी के मौसम में शाम को तो रसोईघर में चूल्हे के पास ही बैठकर खाना खाया करते थे. खाना भी होता था और दुनिया जहान की बातें भी. जब-तब पिताजी अपने सरकारी सेवाकाल की कई बातें सुनाया करते थे. वो बताया करते थे कि वो पुलिस विभाग में सब-इन्स्पेक्टर थे मगर उन्होंने अपना तबादला कोआपरेटिव डिपार्टमेंट में करवा लिया क्योंकि पुलिस विभाग के भ्रष्ट माहौल में उनका दम घुटने लगा. वो अपने ईमान का सौदा किसी भी हालत में नहीं करना चाहते थे और ऊपर के अफसर चाहते थे कि वो स्वयं भी रिश्वत खाएं और उसका एक हिस्सा ऊपर भी पहुंचाएं. आखिरकार उन्होंने पुलिस विभाग ही छोड़ दिया. जब जब वो अपनी ईमानदारी के किस्से सुनाया करते थे, हम दोनों भाइयों के सीने गर्व से चौड़े हो जाते थे और हम घर में जहां तहां मुंह बाए अभावों को हंसते हंसते सहन करने को तैयार हो जाया करते थे.

जीवन चल रहा था, हालांकि हर मौसम की अपनी अपनी तकलीफ थी. गर्मी में, बंद कमरे में,पसीने से लथ-पथ, लालटेन के सामने बैठकर होमवर्क किया करते थे तो कॉपियों पर लिखे गए अक्षर पसीने से फैल जाया करते थे. हाथ का पंखा झलें तो लिखने का काम कैसे करें? ऐसे में हवा का कोई झोंका गाहे ब गाहे आ जाता था तो पसीने से भीगे शरीर को तो एक ठंडा अहसास दे जाता था मगर लालटेन् झब-झब करने लग जाता था. आखिर उसे थोड़ी देर के लिए बुझाना पड़ता था. बारिश में तो हालत और भी खराब हो जाया करती थी क्योंकि सारे मच्छर और पतंगे लालटेन और उसके आस-पास बैठे हम लोगों पर टूट पड़ते थे. ऐसे में अक्सर पिताजी के मुंह से एक कहावत निकला करती थी, सियाले में सी लागै, उन्हाले चालै लूआं, चौमासै में माछर खावै, अै दुःख जासी मूआं यानि सर्दी के मौसम में सर्दी लगती है, गर्मी में लू चलती है, बारिश के मौसम में मच्छर काटते हैं. ये सारे दुःख तो तभी खत्म होंगे जब इस दुनिया से रुखसत होंगे. और हम बड़े संतुष्ट होकर फिर से पढ़ाई में मगन हो जाया करते थे.

जब किसी समस्या का कोई हल है ही नहीं तो उसके बारे में सोचना क्या ? इन तकलीफों ने उन संस्कारों को कुछ और पुख्ता कर दिया जिनके बीज मां और पिताजी ने बचपन से हमारे भीतर रोपे थे. सच्चाई, ईमानदारी, समय की पाबंदी, अनुशासन उन्होंने हमें भाषण देकर सिखाने की कोशिश नहीं की बल्कि स्वयं इनका पालन कर हमारे सामने ऐसे उदाहरण रखे कि ये सारे मूल्य खुदबखुद हमारे जीवन का ज़रूरी हिस्सा बन गए. यदा कदा छोटे-मोटे अभावों के बीच जीते जीते पता नहीं कैसे एक मंहगा शौक़ हम लोगों ने पाल लिया. पिताजी एक दिन एक जर्मन शेफर्ड पिल्ला लेकर आये तो हम सब लोग बहुत खुश हो गए.

हमें खेलने को एक दोस्त भी मिल गया और शायद कहीं न कहीं हमारे अहम को भी एक तुष्टि मिली कि हम भी महंगे शौक़ पाल सकते हैं. पिल्ले का नाम रखा गया जैकी. हम जिधर जाते. पीछे पीछे जैकी भी उधर ही जाता, हमारे साथ भागता दौडता, खूब खेलता.हमें खूब मज़ा आता. बस दिक्क़त एक ही थी. उसे ये सिखाना बड़ा मुश्किल काम था कि जब उसे सू-सू, पॉटी करना है तो घर के पिछवाड़े जाकर करना है जहां गाय बांधी जाती थी. कुछ दिन हमें थोड़ी तकलीफ हुई मगर धीरे धीरे वो पिताजी के कठोर अनुशासन में ढल गया. कुछ ही महीनों में उसका कद कुछ इस तरह निकल कर आया कि लोग अब हमारे घर आने से डरने लगे. जितनी तेज़ी से उसका शरीर बढ़ रहा था उतनी ही तेज़ी से उसकी खुराक भी बढ़ती जा रही थी.

एक वक्त आ गया जब हम घर के सब लोग मिलकर जितनी रोटियां खाते थी, उतनी रोटियां अकेला जैकी खा लेता था. ये वो वक्त था जब गेहूं एक रुपये का एक सेर (किलो से थोडा कम)-सवा सेर आया करता था. अचानक बाज़ार से गेहूं जैसे बिल्कुल लापता हो गया. किसी किसी दुकान में अगर थोड़ा बहुत गेहूं नज़र आता तो भाव होता ढाई रुपये सेर. कौन खरीदेगा ढाई रुपये सेर गेहूं? हर ओर त्राहि त्राहि मच गयी. बड़े बुज़ुर्ग छप्पने अकाल को याद कर कांप गए. तभी सुना कि भारत और अमेरिका में एक संधि हुई है पीएल 870. इस संधि के तहत अमेरिका भारत को वो गेहूं देगा जो बेकार हो चुका है. अमेरिका उस गेहूं को समंदर में फेंकने की बजाय भारत को देगा और भारत में उस गेहूं को राशन की दुकानों के ज़रिए जनता को बेचा जायेगा.

राशन की दुकान से एक रुपये का डेढ़ सेर भाव का ये गेहूं सबसे पहले मैं लेकर आया तो घर के सब लोगों ने कहा ये तो लाल रंग का है, इसकी रोटी कैसी बनेगी? साफ़ करके पिसवाया गया. जब मेरी माँ ने रोटी बनाने के लिए आटा लगाया तो बोलीं इसमें तो न जाने कैसी बदबू आ रही है. पिताजी बोले तुम्हें वहम हो गया है, मुझे तो नहीं आ रही बदबू. हम लोग खाने बैठे तो कौर गले से नीचे उतारना मुश्किल हो गया. पिताजी, भाई साहब और मैं जैसे तैसे आधा अधूरा खाना खाकर उठ गए. मां ने कहा अरे ! इस तरह कैसे चलेगा? आप लोगों ने तो पेट भर खाना भी नहीं खाया.

पिताजी बोले इस गेहूं का स्वाद कुछ अलग है, चिंता मत करो, थोड़े दिनों में इसकी आदत पड़ जायेगी. भाई साहब ने भी पिताजी की हाँ में हाँ मिलाई और मैंने भी मगर मन ही मन हम सब सोच रहे थे कि ये रोटियां हम लोग कैसे खा पायेंगे? कैसे आदत पड़ेगी इन लाल लाल रोटियों की? खाना बनाने के बाद मां खाने बैठीं, उस से पहले उन्होंने जैकी के बर्तन में थोड़े दूध में चूर कर वही लाल लाल रोटियां डालीं. जैकी को भी भूख लग गयी थी शायद. वो तेज़ी से आगे बढ़ा. बर्तन के पास पहुंचा उसे सूंघा और पीछे हट गया. माँ ने हम सबको पुकारा अरे इधर आओ तो सब लोग हम लोग वहां पहुंचे तो देखा जैकी के बर्तन में दूध रोटी रखी हुई है और वो कभी अपने बर्तन की ओर देख रहा है और कभी हमारे मुंह की तरफ. पिताजी बोले भूख नहीं लगी होगी इसे, भूख लगेगी तो अपने आप खा लेगा.

मैं और भाई साहब पढ़ाई में लग गए मगर दोनों थोड़ी थोड़ी देर में उठ उठ कर किसी न किसी बहाने अंदर जाते और देखते कि जैकी ने रोटी खाई या नहीं? नहीं. अभी भी नहीं खाई. अभी भी नहीं खाई. रात को सोने से पहले मैं फिर से जैकी के पास गया, उसने गर्दन उठाई, एक बार अपने बर्तन में पड़ी उन लाल लाल रोटियों को देखा और फिर न जाने कैसी नज़रों से मेरी ओर देखा. फिर गर्दन नीचे ज़मीन पर टिकाकर बैठ गया. दूसरे दिन सुबह उठते ही हम सबने देखा कि जैकी अभी भी अपने खाने के कटोरे के पास बैठा है, मगर रोटियों के उसने मुंह तक नहीं लगाया है.

अब हम सबको चिंता होने लगी कि जैकी को क्या खिलाया जाए? पिताजी ने कहा इसका बर्तन साफ़ करके कुछ ज़्यादा दूध डालकर ताज़ा रोटियां डालो उसमें. मां ने थोड़ा चने का बेसन मिलाकर उस लाल आटे की रोटियां बनाईं. हम सबने जैसे तैसे वो खा लीं, करते भी क्या? हर घर की यही कहानी थी. सभी लोग उसी पी एल 870 गेहूं की रोटियां खा रहे थे. हर रोज़ हर तरफ इन्हीं रोटियों की चर्चा थी. कोई कहता उसे ये लाल गेहूं की रोटियां खाकर उल्टियां होती हैं, कोई कहता इन रोटियों की वजह से उसके शरीर पर चकत्ते होने लगे हैं और कोई कहता लाल गेहूं के कारण उसकी भूख आधी रह गयी है. यानि सब इनसे परेशान थे मगर हमारी परेशानी बाकी लोगों से कहीं ज्यादा थी. हम लोग तो जैसे तैसे अक्सर छाछ के साथ इन लाल रोटियों को निगल लेते थे मगर जैकी ने तो जैसे क़सम खा ली थी इन रोटियों के मुंह न लगाने की.

घर में एक गाय थी, उस गाय का सबके हिस्से का दूध जैकी को पिलाया जा रहा था. फिर भी हमें महसूस होता था कि जैकी का पेट हम नहीं भर पा रहे हैं. ज्वार, बाजरा, चना, जौ सभी प्रकार के अनाज धीरे धीरे बाज़ार से गायब हो गए थे. हमें लगा, शायद जैकी को हम नहीं बचा पायेंगे. लोगों के सामने अपनी ये समस्या रखते तो कोई भी उसे उतनी गंभीरता से नहीं लेता जितनी गंभीर ये समस्या हमें लग रही थी. जिसके भी सामने बात होती, वो यही कहता हुंह, अच्छे अच्छे पैसेवालों के नाज़ुक नाज़ुक बच्चे इसी लाल गेहूं के आटे की बनी रोटियां खा रहे हैं, आपका कुत्ता ऐसा क्या लाट साहब है कि इसे फार्मी गेहूं की रोटियां चाहिए?

हमारे पास इस बात का कोई जवाब नहीं था मगर हम लोग महसूस कर रहे थे कि जैकी बहुत तेज़ी से कमज़ोर होता जा रहा है. आखिर हम सबने बैठकर तय किया कि हम सब अपने खर्चों में थोड़ी थोड़ी कटौती करेंगे और उस बचत किये हुए पैसे से ढाई रुपये सेर का महंगा गेहूं खरीदा जाएगा, उसे घर में ही पीसा जाएगा(क्योंकि चक्की पर पिसवाने देने पर उसमें मिलावट हो जाने का डर था) और उस आटे की रोटियां जैकी को खिलाई जाएंगी.

उन दिनों हम दोनों भाइयों को महीने में दो फ़िल्में देखने की इजाज़त थी. हमने तय किया कि हम तीन महीने में एक फिल्म ही देखेंगे क्योंकि इसके अलावा हमारे ऐसे कोई खर्चे थे ही नहीं जिनमें कटौती की जा सके. शुरू से ही घर की व्यवस्था इस प्रकार की थी कि हमें ज़रूरत की हर चीज़ मुहैया करवाई जाती थी और ज़रूरत होने पर नकद पैसे भी दिए जाते थे मगर आम तौर पर दूसरे बच्चों की तरह जेबखर्च के नाम पर कोई निश्चित रकम हर महीने नहीं दी जाती थी. जैकी की सेहत फार्मी गेहूं की रोटियां खाकर लौटने लगी थी मगर तब तक के जीवन में शायद पहली बार मुझे लगा, सच्चाई, ईमानदारी, अनुशासन सब कुछ एक अच्छे चरित्र का ज़रूरी हिस्सा हैं मगर पैसा भी इस दुनिया में बिल्कुल महत्वहीन नहीं है.

रेडियो जुबानी की पहली किस्त

ज़िंदगी ने छोटी सी अवस्था में एक नया पाठ पढ़ाने की कोशिश की थी मगर मेरा भाग्य बहुत अच्छा था कि इसी बीच एक ऐसी घटना मेरे जीवन में घटी, जिसने सिद्ध कर दिया कि नहीं, ज़िंदगी जो पाठ सिखाने की कोशिश कर रही है वो सही नहीं है. पिताजी की बार बार सुनाई हुई उस अंग्रेज़ी कहावत पर विश्वास और पक्का हो गया कि अगर आपने पैसा खो दिया तो कुछ भी नहीं खोया, अगर सेहत खो दी तो बहुत कुछ खो दिया और अगर चरित्र खो दिया तो सब कुछ खो दिया.

स्कूल में अक्सर हम लोग देखते थे कि लड़के स्कूल से भागकर फिल्म देखने जाया करते थे लेकिन फिल्म देखने के लिए हम दोनों भाइयों को कभी घरवालों से छुपकर नहीं जाना पड़ता था क्योंकि पिताजी के सिद्धांत बहुत साफ़ और पारदर्शी थे. शुरू शुरू में जब हम लोग बहुत छोटे थे तो वो किसी अच्छी फिल्म के लगने पर खुद हमें फिल्म दिखाने ले जाया करते थे, फिर थोड़े बड़े हुए तो पहले पिताजी फिल्म देखकर आया करते थे और फिल्म अच्छी होने पर हम दोनों भाइयों को कहा करते थे कि जाओ फलां फिल्म देख आओ, अच्छी है, जब कुछ और बड़े हुए तो अपने अपने दोस्तों के साथ फिल्म देखने की भी छूट थी हमें. बस उनका कहना था, स्कूल के समय में सिनेमा मत देखो, जब भी सिनेमा देखना हो, इजाज़त की ज़रूरत नहीं है, बस उसकी सूचना घर में होनी चाहिए और कोशिश करो कि जिन दोस्तों के साथ जा रहे हो, वो भी अपने घर में इसकी सूचना दे दें ताकि उनकी वजह से तुम्हें कोई शर्मिंदगी न उठानी पड़े. उन दिनों जैकी के लिए फार्मी गेहूं की रोटियां जुटाने के लिए हम लोग फिल्म के उपवास पर चल रहे थे. यानि तीन महीनों में सिर्फ एक फिल्म. बड़ी कड़की का दौर था.

रेडियो जुबानी की दूसरी किस्त

इसी बीच मेरे तीन बेस्ट फ्रेंड्स ने मेरे सामने फिल्म देखने का प्रस्ताव रखा. ये तीनों ही मित्र बहुत धनाढ्य पिताओं के सुपुत्र थे. निर्मल धारीवाल के पिताजी का के ईएम् रोड पर बहुत बड़ा शो रूम था, हरि प्रसाद मोहता के पिताजी का कानपुर में लंबा चौड़ा व्यापार था और मैं पाठकों से माफी चाहूंगा कि अपने तीसरे मित्र का नाम नहीं लिख पाऊंगा क्योंकि उनके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं. और मेरे वो मित्र आज भी मेरे संपर्क में है और बचपन की उस मित्रता को वही नहीं उनका पूरा परिवार पूरी ईमानदारी से निभा रहा है. आज अगर मैं उनका नाम लिखता हूं तो शायद कहीं उनकी भावनाओं को चोट पहुंचे, जो मैं कतई नहीं चाहूंगा.

बस इतना ही कहूंगा कि मेरे तीसरे मित्र के पिता बीकानेर के माने हुए एडवोकेट थे. इन तीनों मित्रों के सामने धन कोई समस्या नहीं था. सौभाग्य से मुझे भी पिछली फिल्म देखे तीन महीने हो रहे थे. इसलिए फिल्म देखने पर मेरे व्रत के टूटने का भी कोई डर नहीं था. हरि ने अपने भाई के साथ घर सूचना भेज दी कि वो फिल्म देखने जा रहा है, थोड़ा देर से घर लौटेगा, निर्मल महाराज को इसकी भी ज़रूरत महसूस नहीं हुई, उसने कहा घर जाकर बता दूंगा. मेरा घर स्कूल से ज़्यादा दूर नहीं था मगर सूचना तो देनी ही थी. निर्मल और हरि ने मुझे कहा तुम फटाफट सूचना करके प्रकाश चित्र थियेटर पहुंचो हम तब तक टिकट खरीदकर रखते हैं. अब समस्या थी एडवोकेट साहब के सुपुत्र की. उन्होंने कहा मैं अगर पिताजी के पास जाकर पूछता हूं तो मुझे इजाज़त तो नहीं ही मिलेगी, उलटे डॉट पड़ जाएगी. हां तुम सब लोग मेरे साथ मेरे घर चलो तो शायद मेरे पिताजी कुछ न कहें और इजाज़त दे दें. मैंने कहा ठीक है, मैं घर सूचना देकर आप लोगों से प्रकाश चित्र में मिलता हूं फिर हम सब इनके घर चलेंगे.

रेडियो जुबानी की तीसरी किस्त

मैंने अपनी साइकिल उठाई और घर जा पहुंचा. पिताजी घर पर नहीं थे मगर मुझे इस बात की कोई फ़िक्र नहीं थी, क्योंकि मुझे इजाज़त तो लेनी नहीं थी सिर्फ सूचना भर देनी थी. मैंने मां को बताया कि मैं फिल्म देखने जा रहा हूं और मुझे लौटने में थोड़ी देर होगी. बस मैंने अपनी साइकिल उठाई और चल पड़ा फिल्म देखने की की ओर. उन दिनों बीकानेर में न तो वन वे का चक्कर था, न इतने मोटर साइकिल, स्कूटर तो शायद पैदा भी नहीं हुआ था और कारें सिर्फ महाराजा करनी सिंह जी के पास और दो चार शहर के वणिक-पुत्रों के पास थीं. लगभग 20 मिनट में मैं घर सूचना देकर आराम से प्रकाशचित्र पहुंच गया. देखा, निर्मल के हाथ में सिनेमा के चार टिकट मौजूद थे. आज की पीढ़ी के बच्चे, जिनके सामने टी वी पर देश-विदेश के 25-50 चैनल चौबीसों घंटे एक के बाद एक हर भाषा की फ़िल्में परोसते रहते है, इसके अलावा सी डी, डी वी डी, ब्ल्यू रे, पैन ड्राइव, पोर्टेबल हार्ड ड्राइव न जाने कितने साधन मौजूद हैं,जिनमें सहेजकर अपनी पसंद की फ़िल्में वो जब चाहें देख सकते हैं, वो नहीं समझ सकते कि हमारे लिए उस ज़माने में फिल्म देखना किसी बहुत बड़े अभियान से कम नहीं होता था.

विविध भारती पर जब किसी फिल्म के संवादों को काट-छांट कर सप्ताह में एक दिन चित्रध्वनि नामक प्रोग्राम में प्रसारित किया जाता था तो हर शहर, हर गांव में पान की दुकानों पर वो संवाद सुनने के लिए मेला लग जाया करता था. निर्मल के हाथ में फिल्म के टिकट देखकर विश्वास हो गया था कि अब तो फिल्म देखनी ही है, अब हमें फिल्म देखने से कौन रोक सकता है? मैंने साइकिल खड़ी की और निर्मल के पास पहुंचा कि मेरे तीसरे मित्र बोले भायला (दोस्त) भूल गए क्या? अभी तो मेरे पिताजी से परमिशन लेनी है..

निर्मल ने टिकट जेब में रखे और बोला, चलो इसके घर चलते हैं. हम चारों ने अपनी अपनी साइकिल उठाई और चल पड़े लक्ष्मी नाथ जी की घाटी की ओर. 10 मिनट में हम घर पहुँच गए. पूछा, पिताजी घर पर हैं क्या? माताजी ने कहा हां हैं, बैठो तुम लोग, अभी आते हैं. हम बेचैनी से कमरे में इधर से उधर चक्कर लगाने लगे, लगा देर हो रही है, फिल्म्स डिविज़न की न्यूज़ रील तो निकल ही गयी होगी कहीं फिल्म का शुरू का हिस्सा भी न निकल जाए. उस समय रेडियो पर न्यूज़ सुनने को तो आसानी से मिल जाती थी मगर न्यूज़ देखने को तभी मिलती थी जब फिल्म देखने जाया करते थे.

रेडियो जुबानी की चौथी किस्त

थोड़ी ही देर में मेरे मित्र के पिताजी कमरे में आये हम चारों के चेहरों पर एक नज़र डाली और बोले क्या बात है? आज तुम लोग इकट्ठे होकर कैसे आये हो? उनके सुपुत्र ने पहले ही कह दिया था कि वो कुछ भी नहीं बोलेंगे, जो कुछ कहना है, हम लोगों को कहना है. मुझे बड़ा अजीब लग रहा था. जिस खुले वातावरण में मैं पला था, उसमें इस तरह किसी को भी कठघरे में खड़ा नहीं किया जाता. मैं चुपचाप खड़ा रहा क्योंकि अपने मित्र के पिताजी के सामने अपराधी की तरह खड़े रहना मुझे बहुत अपमानजनक लग रहा था. निर्मल ने हिम्मत की और बोला जी अंकल हम चारों फिल्म देखने जाना चाहते हैं. वो बोले अच्छा? तुम तो धारीवाल जी के बेटे हो न?

जी अंकल
अपने घर पूछकर आये हो? फोन करूं धारीवाल जी को?
अंकल मैं बाद में बता दूंगा पिताजी को.
अच्छा मतलब पूछकर नहीं आये हो!

इसके बाद वो मेरी तरफ मुड़े हूं. तुम भी बिना पूछे ही आये होगे क्योंकि तुम्हारे पिताजी तो अभी दफ्तर से आए नहीं होंगे
मैं अब तक के वार्तालाप से बहुत उद्विग्न हो गया था. किसी तरह अपनी उद्विग्नता पर नियंत्रण करते हुए मैंने कहा जी अंकल मेरे घर में फिल्म देखने के लिए इजाज़त नहीं लेनी पड़ती, सिर्फ इसकी सूचना देनी पड़ती है, जो मैं घर जाकर अपनी मां को दे आया हूं.
वो बोले अच्छा?तुम्हारे पिताजी से तो मैं बाद में बात करूँगा क्योंकि तुम्हारे घर तो फोन भी नहीं है. खैर, अभी ये बताओ कि टिकट ले आये हो?

रेडियो जुबानी की 5वीं किस्त

हमें लगा अभी वो कहेंगे अब जब टिकट ले ही आये हो तो जाओ, देख आओ. निर्मल ने झट से कहा- जी अंकल. वो बोले- कहां है टिकट? निर्मल ने जेब से टिकट निकालकर डरते डरते उनके सामने कर दिए. उन्होंने बहुत शान्ति से निर्मल की हथेली पर से टिकट उठाए, दोनों हाथों से उन चारों टिकटों के टुकड़े टुकड़े किए, उन टुकड़ों को खिड़की से बाहर फेंका और बोले, जाओ. काम करो अपना अपना, कोई फिल्म नहीं देखनी है.

हम चारों के चारों सन्न रह गए. मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि सच में उन्होंने टिकट फाड़ दिए हैं, मुझे लगा उन्होंने कागज़ का कोई और टुकड़ा फाड़ा है. अभी वो टिकट हमें लौटायेंगे और हंसकर कहेंगे अरे मैं तो मज़ाक कर रहा था, ये लो टिकट और जाओ. आराम से फिल्म देखकर आओ.. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ..तभी उनकी कड़कती हुई आवाज़ फिर से फिजा में गूंज गई.

पढ़ते लिखते तो कुछ हैं नहीं और इन्हें फ़िल्में देखने को चाहिए. सुनाई नहीं दिया तुम लोगों को? जाओ अपना अपना काम करो और भूल जाओ फिल्म देखना. और हां.तुम अंदर चलो उनके आज्ञाकारी पुत्र चुपचाप नज़रें नीची किये हुए अंदर चले गए. हम तीनों मरे हुई कदमों से उनके घर से बाहर आए. मुझे इतनी शर्मिंदगी हो रही थी कि लग रहा था ये ज़मीन फट जाए तो मैं इसमें समा जाऊं. क्योंकि इस तरह की कंडीशन से अपने तब तक के जीवन में पहली बार मेरा आमना सामना हुआ था. मगर न ज़मीन को फटना था और न वो फटी.

रेडियो जुबानी की छठी किस्त

मैं निर्मल और हरि किसी तरह अपनी अपनी साइकिल तक पहुंचे और चुपचाप वहाँ से चल पड़े. इतना बड़ा झटका हम तीनों के दिमाग को लगा था कि समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या कहकर एक दूसरे को दिलासा दें? कोटगेट से हम तीनों के रास्ते अलग हो गए. हम तीनों ने खामोशी से एक दूसरे की तरफ देखा और अपने अपने रास्ते पर चल पड़े. रास्ते में मैं सोचने लगा, अंकल के लिए सिनेमा के वो चार टिकट महज़ कागज़ के टुकड़े थे जिन्हें कुछ रुपये फेंककर खरीदा जा सकता है, जिनकी उनके पास कोई कमी नहीं है. उन्हें क्या पता कि मेरे लिए वो टिकट रुपयों के पर्याय नहीं थे. मेरे लिए वो टिकट मेरे तीन महीने इंतज़ार का मीठा सा फल थे...

रेडियो जुबानी की 7वीं किस्त

साइकिल पर चलते चलते मैंने अपने आप से कहा, मैं ऐसा क्यों सोच रहा हूं? अगर मैं अपने प्यारे जैकी के लिए महीने में दो बार की बजाय तीन महीने में एक फिल्म देखने का निर्णय कर सकता हूं तो मैं छः महीने फिल्म नहीं देखूंगा तो क्या बिगड़ जाएगा? कुछ भी नहीं. पिताजी कहते हैं, उपवास करने से चरित्र में दृढता आती है. मेरे इस उपवास से भी निश्चित रूप से मेरा चरित्र दृढ होगा. और अंकल ने कुछ पैसों का टिकट ही तो फाड़ा है न? कुछ पैसों के जाने का क्या अफ़सोस करना? और मैंने मन ही मन एक बार फिर दोहरा दिया अगर आपने पैसा खो दिया तो कुछ भी नहीं खोया, अगर सेहत खो दी तो बहुत कुछ खो दिया और अगर चरित्र खो दिया तो सब कुछ खो दिया.

मेरे मन को शान्ति मिल गई थी. मैं बहुत खुश खुश घर में घुसा तो मां ने पूछा अरे तुम इतनी जल्दी कैसे लौट आये? तुम तो फिल्म देखने जाने वाले थे न? मैंने हंसते हुए जवाब दिया आज की फिल्म बहुत छोटी थी मगर बहुत अच्छी और शिक्षाप्रद थी. मेरी सीधी सादी भोली भाली मां को कुछ समझ नहीं आया मगर उन्हें शायद इस बात से कोई मतलब भी नहीं था कि मैंने कौन सी फिल्म देखी है और कौन सी नहीं. उन्हें तो मुझे खुश देखने से मतलब था. मैं खुश खुश सीढियां चढ़कर अपने मालिये की तरफ जा रहा था और उनके संतुष्ट होने के लिए इतना काफी था.

'भाई को कैंसर की वजह से 4 साल लिख नहीं पाया'

46
शेयर्स

पेश है दी लल्लनटॉप की नई सीरीज रेडियो जुबानी की 12वीं किस्त. इस सीरीज में हम आपको महेंद्र मोदी के लिखे रेडियो से जुड़े किस्से पढ़ा रहे हैं. बीकानेर में पैदा हुए महेंद्र मोदी मुंबई में रहते हैं. रेडियो में 40 साल से ज्यादा का एक्सपीरियेंस है. विविध भारती मुंबई में लंबे वक्त तक सहायक केंद्र निदेशक रहे.

अब तक आप इस सीरीज की कई किस्तें पढ़ चुके हैं. अब पढ़िए कि जब महेंद्र मोदी अपने भाई की बीमारी की वजह से सालों तक लिख नहीं पाए.


 

मैंने पिछली कुछ कड़ियों में ज़िक्र किया था कि जब भी बचपन में मैं और मेरे बड़े भाई खेला करते थे, तो अक्सर मैं बड़े भाई की भूमिका में रहता और वो छोटे भाई की भूमिका में. ना जाने ये खेल कब हम दोनों की ज़िंदगी में कुछ इस तरह शामिल हो गया कि पूरी तरह से आत्मनिर्भर होते हुए भी कुछ बातों में खेल ही की तरह भाई साहब मुझे बड़े भाई के आसन पर बिठा दिया करते थे. और मैं पहले तो मुंह बाए उनकी तरफ देखता रह जाता लेकिन फिर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में जुट जाता. 2008 में मैं विविध भारती की गोल्डन जुबली के कामों में पूरी तरह खोया हुआ था कि भाई साहब का फोन आया.

महेंदर
जी
यार मैंने तुमसे कहा था ना एक बार कि मेरे प्रोस्टेट में कुछ प्रॉब्लम है, मुझे वो प्रोस्टेट कैंसर लग रहा था
हां डॉ. साहब लेकिन हम लोगों ने सारी जांचें करवाई थीं और वो कैंसर नहीं था

लंबी सांस भरते हुए उन्होंने कहा था, हां वो तो कैंसर नहीं था लेकिन मेरे पेट में आजकल बहुत जोर का दर्द उठता है. मुझे लगता है ये इन्टेस्टाइन का कैंसर है.

मैं उनके मुंह से फिर कैंसर का नाम सुनकर कांप गया. एक तरफ मन कह रहा था कि उन्हें शायद फिर से वहम हो रहा है लेकिन दूसरी तरफ लग रहा था कि डॉक्टर वो भी इतना अनुभवी सर्जन, उन्हें वहम क्या होगा ? कहीं ना कहीं कुछ तो गड़बड़ है.

वो फिर बोले, महेंदर कुछ कर. इस बार ये कैंसर ही है.
मेरा दिल बैठ रहा था लेकिन मैंने उन्हें ढाढस दिलाते हुए कहा, आप चिंता मत कीजिए मैं कल आ रहा हूं बीकानेर, फिर सोचते हैं कि क्या करना चाहिए.

विविध भारती के गोल्डन जुबली कार्यक्रमों को अपने साथियों, कांचन जी, जोशी जी, कमलेश जी, कल्पना जी, यूनुस खान को सुपुर्द किया और उसी शाम जयपुर की फ्लाइट पकड़ी और दूसरे ही दिन बीकानेर जा पहुंचा. भाभी जी, बाई, मिनी सबके सब परेशान थे. हालांकि मन ही मन मैं खुद भी बहुत डरा हुआ था लेकिन अपने डर को काबू करते हुए मैंने भाई साहब को कहा, हम दिल्ली चलते हैं, मैंने नेट पर देखा है वहां के फोर्टिस अस्पताल में एक बहुत अच्छे डॉक्टर हैं पेट के रोगों के.

भाई साहब बोले, मुझे पता नहीं, जैसा तुझे ठीक लगे कर. हम निकल पड़े दिल्ली के लिए. रास्ते में भी भाई साहब बहुत बुझे बुझे रहे. एकाध बार बात हुई तो मैंने उनसे पूछा, आपको ऐसा क्यों लग रहा है कि ये कैंसर है? वो बोले, तू आ गया है तो लगता है सब ठीक हो जाएगा लेकिन महेंदर पता नहीं क्यों, मुझे हमेशा लगता है कि कैंसर कहीं ना कहीं मेरे शरीर में पल रहा है.

मैंने उन्हें फिर दिलासा दिया कि कई बार हमारे दिल में ऐसा वहम बैठ जाता है जिसका दरअसल कोई वजूद नहीं होता और नींद की गोली देकर सुला दिया. दूसरे दिन दिल्ली पहुंचकर हम लोग फोर्टिस पहुंचे. रजिस्ट्रेशन के बाद से लेकर डॉक्टर के कॉल करने तक का दो घंटे का वक्त हम दोनों के लिए बहुत तकलीफदेह था. मैं कोशिश कर रहा था कि भाई साहब को बातों में लगाकर उनके तनाव को कुछ कम करुं लेकिन वो सिवाय हां हूं के कुछ नहीं बोल रहे थे. और इससे मेरा तनाव बढ़ता जा रहा था.

मेरे दिमाग में भाई साहब का एक ही वाक्य बार बार घूम रहा था. महेंदर पता नहीं क्यों मुझे हमेशा लगता है कि कैंसर कहीं ना कहीं मेरे शरीर में पल रहा है. मुझे याद आया, भाई साहब ने एक बार कहा था, आजकल डॉक्टर मानने लगे हैं कि कैंसर भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलने वाली बीमारी है और हमारे पिताजी की मृत्यु से चार दिन पहले पता चला कि उन्हें कैंसर था जबकि कैंसर की सेकेंड्रीज मुंह में नज़र आने लगी थी. डॉक्टर्स ने कह दिया था कि प्राइमरी कैंसर कहां है अब पता लगाने से कोई मतलब नहीं निकलेगा बस तरह तरह के टेस्ट करके हम इन्हें तकलीफ ही देंगे.